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Orientation Matters







People crave for results, fruits, comfort, pleasant situation, power, fame, good health, fashion, glamour and so many things. Surprisingly, many of them want it free of cost with no sacrifice.

The world "free" is very attractive and probably searched frequently on all search engines too. In my 30 years of practice, I experienced it very closely with people of almost all age groups. The situation is so discouraging that, if you advise someone to pursue and take some pain, he feels offended. What does it mean? Only taking, collecting, managing to have and never give apart, not to be bothered and, all this reflects orientation of a person. In the age of technology, we find people believing more and more in "things will settle automatically" and the outcome will be as per their requirement.

Please allow me to be rude to say that thief are not just the people who steal something, doing nothing and expecting all good is a big theft. In fact, it hurts constantly, if it has become habit.

How To Overcome Such Orientation Or Mentality


Now the question comes how to overcome such orientation or mentality. There are two kinds of people, one, those who wants change, but just lack motivation or some kind of backing, second, those who are by nature big thief and always avoid taking efforts , for this kind of people, to be very frank, no outside motivation works, they will repeatedly go through a number of lessons in life and till the time they really understand , time would have gone for them to make a change. I know I am rude here in writing this truth but it would be unjustified if I don't show real picture. 

For those who want to make a real change, I would like to go on writing.. Count your active life left , that too now, be realistic, see who are the people whom you never noticed, but helping you without exceptions, I know many of you would answer, "I don't have time" but just think, if everyone says the same thing, no one would have time for others and our tiny world would become more selfish which is already happening. It's your call, it's your priority or orientation, which will define your destiny too.

Don't lose hope, initially it will sound very odd because you are not attuned to "work-deserve-results" mode. Gradually, it will be new normal and, have my words, you will be proud of yourself with a wonderful feeling of good life with better orientation.


 CA Ashok Madrecha
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जीवन की दशाएँ ( Direction in Life )




सामान्यतया हम सभी जीवन को तीन दशाओ में व्यतीत करते है और पूरे जीवन में इसके बारे में बहुत कम सोचते है। आइये इन तीनों दशाओं के बारे में कुछ जानने की कोशिश करे।

धन संग्रह दशा :

प्रथम जीवन का प्रमुख भाग रोजगार, धन दौलत कमाने में निकलता है। स्वाभाविक है कि कोई भी धन के द्वारा अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहेगा। धन से संसार की अधिकांश आवश्यकताएं पूरी हो सकती है ऐसा विश्वास भी हर जगह पाया जाता है। धन महत्वपूर्ण है परंतु कितना ? यदि धन हमें शांति के साथ ख़ुशी दे रहा है तो ठीक है परंतु धन के कारण ही घर परिवार की सारी खुशियों पर ग्रहण लग जाये तो कोई भी विवेकशील मनुष्य इस पर विचार करेगा और जरुरत हो वैसे जीवन में परिवर्तन भी लायेगा। धन प्राप्ति के संसाधन और तरीके कैसे हो इस पर चिंतन की जरुरत है।

प्रसिद्धि और मान्यता की दशा :

ज्यो ही धन की उपलब्धि के नजदीक पहुचते है हम सभी जीवन में एकाएक प्रसिद्धि नाम के लड्डू को खाने के लिए बेचैन हो जाते है। पता नहीं क्यों हमें ऐसा लगने लगता है कि जितना लोग हमें मान सम्मान देंगे उतना ही जीवन धन्य होता जायेगा। इस प्रसिद्धि को पाने के लिए हम कई तरह की योजनाएं बनाने लग जाते है और कई बार तो अनचाहे लोगों को भी मित्र बना लेते है। मूल रूप से सोचने वाली बात ये हे की क्या किसी व्यक्ति, समूह, मिडिया, या संग़ठन के मानने से ही आप सम्मानित होते है या आपकी अंतरात्मा के आईने में सत्य के रुबरु होकर अच्छा महसूस करते है। क्यों हम स्वयं को इतना लघु मान लेते है ? प्रसिद्धि की इस झूठी दौड़ में पैसा और मन की शांति, दोनों को दांव पर लगा देना कहाँ की समझदारी है? यह महादशा धार्मिक और अधार्मिक दोनों पर समान रूप से हावी होती है।आजकल तो अखबारों की सुर्खियों में आने के लिए काफी बड़ा विनियोग हो रहा है। दुःख तो तब और बढ़ जाता है जब आपने पैसे भी खर्च कर दिये और मनचाहा परिणाम नहीं मिला। जीवन की इस दशा को में अपने शब्दों में शनि की महादशा भी कह दू तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

दिग्भ्रांति की दशा :

यह दशा उपरोक्त दोनों दशाओं के साथ साथ चलती है और मौका देखकर इंसान को सतत परेशान करती रहती है। इस दशा में कोई भी मूल उद्देश्यों  यानि धन प्राप्ति एवं प्रसिद्धि हेतु इतना भृमित और व्यस्त हो जाता की उसे संबंधों यानि मित्रता, परिवार, समाज आदि के बारे में या तो सोचने का समय ही नहीं मिलता या वो उन सभी को खुद के हिसाब से परिभाषित करने लग जाता है।

एक कथित रूप से धनी और प्रसिद्ध व्यक्ति के दिग्भ्रमित होने के लक्षण इस तरह से पाये जाते है :

1. हंसी में कमी या बनावटी हंसी
2 हर समय महत्वपूर्ण दिखने की बीमारी
3 असहज पहनावा
4 स्वयं को बड़ा ज्ञानी मानना
5 समारोह इत्यादि में चमचो से गिरा होना
6 सही दोस्तों की भारी कमी
7 व्यस्तता दिखाने में महारथ
8 रिश्तदारों एवं मित्रों पर उपेक्षा भाव
9 प्रभुत्व स्थापित करने की प्रबल इच्छा
10 मानसिक तनाव
11 इतना सब कुछ होकर भी शरीफ होने का नाटक।

ये कुछ लक्षण बीमारी के आरम्भ के बताये गए है । गंभीर अवस्थाओं में इन लक्षणों की संख्या बढ़ जाती है। कुछ लक्षण एक आम आदमी तुरंत ताड़ लेता है तो कुछ लक्षणों को समझने के लिए अनुभव की जरुरत होती है।

संसार में सभी अपना कृतत्व करते है और अपने हिसाब से जिंदगी जीने का उपक्रम करते है। प्रश्न पैदा होता है कि क्यों हम जीवन को इतना उलझा देते है? क्यों हम स्वयं अपने आप पर भरोसा नहीं करते ? आज भी सच्चे और अच्छे लोगो की बहुत भारी मांग है पर हम सभी छोटे रास्तो की तलाश करते रहते है । शायद यही वजह है कि हम अंदर से खोखले होते रहते है और फिर औरों की मान्यताओं और सम्मान के लिए किसी भी हद तक गिर जाते है। जीवन और आत्मा के संबंध को हमें हमेशा याद रखना चाहिए ताकि हम अपने विवेक से ससमय समझ सके की कौनसी दशा हम पर हावी हो रही है और क्या परिवर्तन लाना चाहिए।

अशोक मादरेचा

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Happening Quotient

Recently I was going through the trend of commonly asked questions raised by people in seminars on motivation, I clearly sensed that there is a common tendency of having lack of clarity about how to get things done faster and most of the questions were raised had same essence, though raised in different words and tones by different individuals.
Previous experience says that everything which happens always had its very own "happening quotient". Happening quotient is like feasibility apprehended in advance. In larger term it includes mapping of resources, approach, timing, location and anticipation of probable situations. We come across many people with repeated complaints about many things not happening as per their wishes. In the reply to them, some may talk about destiny and others will talk about blaming something and things goes on. 




Let us understand it more precisely, farmers sow seed and grow crops. It's not as easy as it is mentioned. The combination of timely seed sowing in fertile land with availability of adequate rain or water, sunlight, fertilizer and constant care all resulted in a good crop. What is important here is to understand in simple term that to get success or accomplishing something one has to understand its probability in context with other factors and resources and its availability in a given situation.

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