Oct 7, 2018

आशा (Hope)



आशा जीवन है, और निराशा मृत्यु
पल प्रति पल इन दोनों के बीच
हम झूलते निरंतर क्यूं
कभी आशा का पलड़ा भारी
कभी निराशा होती भारी।
रोज नई चुनौतियों से मुकाबला
शायद कुदरत की व्यवस्था है ताकि
मनुष्य की जीवन यात्रा नीरस ना हो।
हर रोज कुछ ना कुछ नया होता है
अनहोनी होने से ज्यादा तो उसका डर होता है।
प्रश्न है कि हम कितना सचमुच जीते है
जीना और समय व्यतीत करना
इन दोनों के फर्क को समझना
है तो बहुत जरूरी
पर कथित व्यस्तता सबके जीवन की
स्वीकृत त्रासदी बन चुकी है
और ये त्रासदी अब तो आदत बन चुकी है।
बिगड़ा नहीं कुछ भी
उम्मीद से हर काम बनता है
आओ जीवन मूल्यों को गतिमान करे
अंतर से प्रेम का आवाहन करे
सर्व हित में कुछ तो सृजन करे
अहंकार का विसर्जन करे
समझो कि बहुत प्रबल ये मन है
आशा तो अमर धन है
आशा तो अमर धन है।


Hopes and despair are part of life. The above Hindi poem states that we must take things in proper perspective and remain positive in life. You may also like my other poem on Journey

......... अशोक मादरेचा

Sep 9, 2018

Jainism सत्य और अहिंसा


साध लो मौन को, संतुलन स्वयं सधेगा
समय का अवांछित खर्च भी बचेगा।

हरदम कुछ प्रमाणित करने की चाहत
कोई खुश होगा तो कोई होगा आहत।

इस दौर में चरित्र का दोहरापन आम है
मत गिनो, इस सूची में बहुत से नाम है।

कल एक इंसान पे बहुत हंसना आया
कहता था, वो दूसरा इंसान खोज ना पाया।

बहुत सी भ्रांतियां पाले हम जीते है
भरे हुए दिखते पर अंदर तक रीते है।

करुणा और मैत्री सिमट गई किताबों में
महावीर की अहिंसा, आती है ख्वाबों में।

जीवन को फिर से जानने की जरूरत है
कितने बचे लोग जिन्हें सोचने की फुरसत है।

अपने दायित्व से मुंह मोड़ कर क्या हासिल कर लोगे
क्या सचमुच तुम जीत करके भी हार को वर लोगे।

इतना जल्दी मत हारो, विकारों का प्रतिकार करो
प्रांसगिक है आज भी सत्य और अहिंसा, करो तो जयजयकार करो।

--- अशोक मादरेचा  at the time of Jain Prayushan 2018


Sep 3, 2018

भीड़ (Crowd)



भीड़ क्या होती हैं?

ज्यादातर भीड़ प्रायोजित होती है। स्वस्फूर्त भीड़ तो बहुत ही कम होती है। भीड़ का अपना कोई दिमाग नहीं होता इस कारण इसे शातिर लोग जैसा चाहे हांकते है। सामान्य मनुष्य तो भीड़ के पीछे का हेतु समझ ही नहीं पाता। भीड़ के प्राण सामूहिक भावों में बसते है। जब तक इन भावों को भीड़ की मानसिकता में बसाए रखा जाता है भीड़ बिखरती नहीं।

भीड़ के ५ प्रकार

भीड़ कई प्रकार की होती है पर मुख्य रूप से निम्न प्रकार की प्रचलन में है :

1. धार्मिक समूहों की भीड़
2. राजनीतिक फायदे वाली भीड़
3. सामाजिक कार्यक्रम वाली भीड़
4. मनोरंजन वाली भीड़
5. अकस्मात घटनाओं से प्रेरित भीड़

इसके अलावा कुछ भीड़ उपरोक्त में से दो या तीन प्रकार की एक साथ भी हो सकती है। भीड़ के मनोविज्ञान कोआज के युग में समझना बहुत जरूरी हो गया है। भीड़ के माध्यम से न जाने क्या क्या काम हो जाते है। हर भीड़ के बड़े बड़े प्रायोजक बहुत बड़े बड़े बजट ले कर काम करते है। इस भीड़ के द्वारा कोई अपना कद या प्रभाव दिखा पाता है तो कोई अपनी पहुंच। भारत जैसे देश में तो बहुत से व्यक्तियों के लिए ये रोजगार बन चुकी है।

अब मुद्दे की बात है कि में भीड़ के बारे में इतना क्यों लिख रहा हूं। जब अनपढ़ लोगों के साथ साथ बुद्धिजीवी भी भीड़ की मानसिकता में जीने की राह खोजने की चेष्टा करते है तो बहुत दुख होता है। किसी विचार की मौलिकता परखे बिना आंख बंद करके किसी का अनुसरण करना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। शायद इसी अवस्था में लोगों को देख कर मुझे इस पर लिखने का विचार आया। कोई कुछ भी कह दे या कोई घटना होती है तो इसके पीछे छुपे हुए हेतु को समझना चाहिए। तुरंत प्रतिक्रिया और भीड़ इकठ्ठा कर लेना शायद किसी और का मकसद हो और आप अनजाने में ही इसका शिकार हो रहे हो इसका ध्यान रखना चाहिए।

भीड़ के बारे में सावधानी बरतिए


आपको जीवन के हर मोड़ पर भीड़ इकट्ठा करने वाले लोगों से सावधान रहना होगा। भीड़ से माहौल दिखता है पर रचनात्मकता भीड़ से नहीं आ सकती। आपको भीड़ में सब साथ में दिखाई देंगे पर अकेले में आपकी मुसीबत में ये भीड़ कभी साथ नहीं देगी। भूलकर भी भीड़ पर मत इतराना नहीं तो सच्चाई से सामना करना मुश्किल हो जाएगा। भीड़ जब छट जाती है तो वहीं माहौल सूनेपन में तब्दील हो जाता है।

थोड़ा और इस विषय को रोचक बनाए तो भीड़ को दो और पहलू पर विचार करना होगा। कुछ भीड़ सुखप्रेरित होती है तो कुछ दुख प्रेरित। सुख प्रेरित भीड़ में सपने दिखाएं जाते है और दुख प्रेरित भीड़ में दुख की पीड़ा दिखा कर सहानुभूति की खेती की जाती है। दोनों ही भीड़ के प्रायोजकों की भरमार है बस आप उन्हें देख नहीं पाते।

आशा है आपको भीड़ के मनोविज्ञान पर मेरे विचार पसंद आए होंगे। आपके सुझावों का मुझे इंतज़ार रहेगा।

धन्यवाद। अशोक मादरेचा

Jul 15, 2018

Nature कुदरत



दुआओं की इमारत में रहता हूँ
आपने पूछा इसलिए कहता हूँ
नायाब इंसानियत की मजबूत दीवारे
प्यार की खुशबू, मौजों के फव्वारे
शांति के सागर में चांदनी की छटा
फैले आकाश में बादलों की घटा
चहुँ ओर फैली कुदरत की सुंदरता
गुलशन में उमड़ती फूलों की मादकता
भोर की अंगड़ाई, शीतल पवन का चलना
पनघट की ओर पनिहारिनों का निकलना
सिंदूरी आकाश में सूरज का आना
चिड़ियों के झुंड का खूब चहचहाना
नवकोपलों में व्याप्त होता परिपूर्ण जीवन
अभिव्यक्ति में असमर्थ गदगद होता मन
कलकल करते झरनों के पानी पर पड़ता प्रकाश
प्रकृति की हर रचना देखो होती कितनी खास
सब ये सोचकर मन को त्राण मिलता है
वर्षा से जैसे मरुधरा को प्राण मिलता है
नमन है प्रकृति को बारम्बार यही कहता हूं
बस दुआओं की इमारत में रहता हूं ।।

Jun 20, 2018

समझदारी (Intelligence)



Hindi poem on reality of present life. it describes about our illusion, selfishness, ego, power, relationship and complexity of life



किसमें खुशी खोजते कुछ भी भान नहीं
अच्छे बुरे का कुछ ध्यान नहीं
आखिर समझदार जो हो गए है।

हर जगह खुदगर्जी का वर्तन
पसंद नहीं आते अच्छे परिवर्तन
आखिर समझदार जो हो गए है।

सिर्फ लेने में भरोसा, देने से कोसो दूर
तनाव और दुख में भी हंसने को मजबूर
आखिर समझदार जो हो गए है।

जमीन छोड़ दी, कुर्सियों के पीछे पड़ गए
चमक दमक में बचपन के दोस्त भूल गए
आखिर समझदार जो हो गए है।

सेहतमंद खाना छोड़ पिज्जों में उलझ गए
खुलकर हंसना छोड़ हम बहुत गम्भीर हो गए
आखिर समझदार जो हो गए है।

सहजता को मूर्खता कहते है
कुछ किताबें चाटकर गरुर पालते है
आखिर समझदार जो हो गए है।

अपनों के बीच भी परायों सा जीवन
हर जगह खुदगर्जी का वर्तन
आखिर समझदार जो हो गए है।

नकारते सच को मुखौटे पहनकर
अनसुना कर देते सच को सुनकर
आखिर समझदार जो हो गए है।

लगे है जोड़ने को पता नहीं कितना जोड़ेंगे
हम रिश्ते तोड़ देंगे पर जिद नहीं छोड़ेंगे
आखिर समझदार जो हो गए है।

-- अशोक मादरेचा

Jun 4, 2018

अनबोले संदेश (Unspoken Message)


बहाने को अश्क शेष नहीं थे
पथराए से दोनों नयन थे
इंतजार के भाव थे
बेशक दिल में कहीं तो घाव थे।

वो नियति के मारे
शून्य को घूरते थे
आकाश भरा अकेलापन
शायद किसी को ढूंढते थे।

जैसे कई तूफान गुजरे उन पर से
बिखरे केसूओं से झांकते थे
गुजरते राहगीर उस तरफ
कुछ अजीब से आंकते थे।

होठों की कंपकपाहट के बीच
शब्द आकर तो लेते थे
मैं करीब गया, पर समझ नहीं पाया
अजनबी  "अशोक " को वो कुछ तो कहते थे।

Apr 28, 2018

पीछा करता सत्य (Chasing Truth)


जिन्हें समय दिया जिंदगी भर
वो कहते है उन्हें फुरसत नहीं ।

व्यस्त है या बनाते बहाने
जरूर कुछ, गलतियां तो हुई ।

नए मित्रों के संग, नए नए प्रसंग
परिस्थितियां आज, बदल गई ।

जवानी है, ऊर्जा भी चरम पर
दृष्टि शायद कुछ बदल गई ।

अहसास कराने, कुछ भी कर लो
नावों की पतवारें तो फट गई ।

सब कुछ गतिमान अमर्यादित सा
शर्मो हया भी तो मिट गई ।

कुछ अनहोनी का अंदेशा हर किसी को
मानवता की तो नींव हिल गई ।

बेशुमार दौलत की उपलब्धियां
पर सेहत उनकी लील गई ।

सबके सब सपनों के सौदागर
सच्चाई अंदर ही अंदर घुट गई ।

बतियाना तो दूर, वो रुकते भी नहीं
कैसे बताऊं उनकी गाड़ी तो छूट गई ।

----- Ashok Madrecha





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