समाज की सच्चाई


जाने अनजाने हम क्यूँ अमरता का आभास करते है
खूब करते दिखावा और कितनों का परिहास करते है।
हर बात में अपने अहम् का पालन अब सहज हो चला
कुछ करने की जल्दी में रिश्तों की चिंता क्यूँ हो भला।
अर्थ के बुखार में समय सीमित लगने लगा है
क्या बुढ़ापा क्या जवानी, बचपन भी रोने लगा है।
हर मनुज दोहरी जिंदगी जीने को मजबूर हुआ
भाग रहा इधर उधर स्वयं से कितना दूर हुआ।
अपनों के बीच बैठ बतियाना अब कहा दिखता है
हर चीज के होते मोलभाव , रोज जमीर बिकता है।
बटोरतें सुर्खियां अख़बारों में विज्ञापनों का दौर चल रहा है
सिर्फ पदों का बंटवारा , देखो कैसे समाज बदल रहा है।
हुए कब्जे पानी और जमीनों पे हवाएं अब मुश्किलो में है
धर्म राजनीति का शिकार है न मालूम और क्या दिलो में हे।
ओरो की छोड़ो परिवारों में राजनीति हावी होने लगी
उलझनों के दावपेच में करुणा मैत्री तो खोने लगी।
जरूरतों के पहाड़ के नीचे दबा इंसान कितना अकेला है
साफ है मकान उसका पर अंदर से कितना मैला है।
अहसास तो होता है पर स्वीकार नहीं करते
नियति कहके उसको सब तिल तिल मरते।
हर ख़ुशी कल पर टाल कर वर्तमान की बलि चढ़ा दी
जो मिला उसमे सबर नहीं, नहीं मिला वहाँ नजर घड़ा दी।
सरलता छोड़कर उलझनों को अपनाया
खुद के बजाय ओरों को सुधारने में वक़्त गवांया।
नेता की पदवी मिली समाज में तो मन बहुत इठलाया
हर वक़्त जुगाड़ में रहे कि कौन क्या लाया।
शिकायत है इनको आजकल नींद नहीं आती
मन अशांत है खुशियां करीब नहीं आती।
एक भी ऐसी रात नहीं ये कोई अचरज की बात नहीं
वो भीड़ में अलग दीखते होंगे पर कोई उनके साथ नहीं।
मै सच कहता हूँ इस महफ़िल में
बुरा मत लगाना कोई भी दिल में।
यहाँ जीवन तमाशा बन गया और सब चुपचाप है
अब ऐसा मत कहना कि यहाँ बोलना भी पाप है।
वक़्त रहते हम्ही को बदलाव लाने होंगे
टूटते परिवार और रिश्तों को बचाने होंगे।
गौरवशाली है संस्कार हमारे भावी पीढ़ी को ये समझने दो
अवसर दो अशोक अब उनको आगे बढ़ने दो।

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4/ 5
Oleh

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