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23 दिस॰ 2015

इजहार



तूफानो में भी हर सफ़र आसान है
सिर्फ तेरी पनाहों का अहसान है।
उन लम्हों को क्या पता
मेरी तेरी वो गुफ़्तगु और खता।
सिमट के पहलु में छुप जाना
बातों बातों में वो खिलखिलाना।
वेसे भी ये सब करिश्मों से कम नहीं
साथ हो हरदम, अब कोई गम नहीं।
आँखों में स्नेहिल समर्पण के भाव
तपती धूप में जैसे बरगद की छाँव।
दिन सिमट जाता रात के आग़ोश में
फिर राते भी कहा रहती है होश में।
सब कुछ शब्दों में कहना मुश्किल है
बस आप हो, मै हूँ, और ये मेरा दिल है.......।

27 जुल॰ 2015

तड़पन



बरसों से बिखरा हुआ हूँ, अब तो मुझे सवाँर दो
बहुत तन्हा हूँ, थोड़ा ही सही पर कुछ तो प्यार दो।

वफ़ा के आइनों में पाक चेहरे कहाँ से लाऊँ में
बंद है दरवाजे सब बताओ कहाँ तक जाऊं मै।

वक़्त बदलता रहा , शहर के बाजारों की तरह
हमने शहर बदले आपकी तलाश में बंजारों की तरह।

उम्मीदों की रौशनी में हर पल याद आते हो
मेरे अपने हो फिर भी इतना जुल्म ढाते हो।

झील सी आँखे चेहरे पे गजब का नूर था
सिर्फ नज़रों से बाते की, मेरा क्या कसूर था।

इश्क के उसूल नहीं मालूम, आपका आना जरुरी है
बिलकुल मत कहना इस बार, फिर कोई मज़बूरी है।

22 नव॰ 2014

उम्मीदों का आँगन



वक्त के भाल पर सिलवटें बढ़ने लगी
मंजिल साधने आरजु उमड़ने लगी।
जान लो कि में ना थका नहीँ हारा हूं
आज भी बदस्तुर सिर्फ तुम्हारा हूँ।
तपते रेगिस्तान में फुहार आई
आप क्या आये बहार आयी।
इंतजार तो बहुत हुआ पर गम नहीं
सामने हो आप ये कुछ कम नहीं।
वादा करो हर वक़्त रूबरू रहोगे
हमसे हर गिला शिकवा कहोगे।
रोशन हुआ जहां आपकी नजरो से
क्या खूब निकले हम सब खतरों से।
साकार करेंगे हर एक सपना
आबाद रहे ये सकून अपना।

- अशोक मादरेचा

8 सित॰ 2014

घर और इंसान



हमने ठिकाने बना लिए और
उनको मकानों का दर्जा भी दिया
काश घर बनाये होते
बेशक इतना कर्जा भी लिया।
हर दीवार चमकीली हे
सजा दिया बहुत सुन्दर तरीके से
गरूर का सामान बना दिया
क्या सकून भी लाये कुछ सलीके से।
सब सामान की जगह बना दी
हर कोने को भर दिया
आ जाते बूढ़े माँ बाप साथ रहने को
लगता कुछ तो अच्छा कर दिया।
हम आग से खेलते हे
पानी में बहते हुए
जिंदगी गुजार लेते हे
अजनबी से रहते हुए।
दौरे खुदगर्जी के तूफान में
इल्म रास नहीं आएगा
चलते रहना , गिरना मत
वर्ना कोई पास नहीं आएगा।
मकान तो बहुत हे कहने को
घर कहाँ मिलते हे
शरीर बहुत हे चलते फिरते
पर साथ चलने को इंसान कहाँ मिलते हे ।

29 जुल॰ 2014

सरहदों के मजबूर परिंदे
















जिन्हें मार दिया बेरहमी से आपने
वो परिंदे तो पानी की तलाश में थे।
सरहदों को नहीं समझते वो तो
प्यास बुझाने की आस में थे।
इंसानों ने बाटा जमीं आसमान को
वो तो उड़ते भी पास पास में थे।
गिरे तुम्हारी गोलीयों से जमीं पर
कितने सवाल उनकी साँस में थे।
यूँ मौत का सामान बनेगा इन्सान
मंजर ये निशां हर एक लाश में थे।
जिन्हें मार दिया बेरहमी से आपने
वो परिंदे तो पानी की तलाश में थे......।

……… अशोक मादरेचा

4 जून 2014

प्यार का संदेश (Message of Love )


हर रंग की चमक में बसते हो
कोई से भी गम में हँसते हो।
ये दिलेरी हे या अदाकारी
प्रेरित हो या , खुद की समझदारी।
बख़ूबी सब कुछ छुपाते हो
बस सिर्फ मुस्कराते हो।
मासूम चेहरा, इरादों से बुलंद हो
बोलते कम , बड़े स्वछंद हो।
हर पल ख्याल तेरा ही क्यों आता हे
क्या नाम दू इसे , जाने कौनसा नाता हे।
गीतों के गुंजन से भरा तेरे लबो का अहसास
समझ भी लेते मन की बात , तुम काश।
अब दूर नहीं रहना हे
मुझे कुछ कहना हे।
ये पैगाम पढ़कर रुक मत जाना
देर हुई पहले ही , अब मत सताना।
 ये हे प्यार का फ़साना , अब क्या जताना
मेरे मीत जल्दी आना , बस जल्दी आना।
------------ Ashok Madrecha

27 मार्च 2014

शेर शायरिया

शेर शायरियाँ 


नजरे मिला कर भी छुपा लेते हो अक्श को
क्या ये गफलत हे या शरारत आपकी।
कहते नहीं कुछ भी शायद मौन अजीज हे
शिकवा तो नहीं करते पर ये सजा ज्यादा हे।
मेरी इन्तहा मत लो सहने को घाव काफी हे
छोड़ दो मेरे हाल पे, जान लो कि में भी बेसब्र हु।
मंजिल कुछ भी हो साथ चलने को साथी हो बस
सफ़र आसां होगा गर आप यु रूठो नहीं।
गलत भी समझो मुझे तो ये भी नसीब हे मेरा
कह तो सकेंगे , मेरे हमदम ने कहा ऐसा।
पैगाम उन्हें ना मिला पर हलचल तो हे
मालूम नहीं कौनसा गुल खिलने वाला हे।
खयालों के तूफां को बहुत झेला अकेले ही
दो पल ही सही कुछ तो बोलो मुस्करा कर।
वीराने में औस गिरी , पर अंगारो पर
चाँद को नहीं मालूम क्या गुजरी बहारो पर।
_______  अशोक मादरेचा

प्रयास (Efforts)

जब सब कुछ रुका हुआ हो तुम पहल करना निसंकोच, प्रयास करके खुद को सफल करना। ये मोड़ जिंदगी में तुम्हें स्थापित करेंगे और, संभव है कि तुम देव तु...