27 मार्च 2014

शेर शायरिया

शेर शायरियाँ 


नजरे मिला कर भी छुपा लेते हो अक्श को
क्या ये गफलत हे या शरारत आपकी।
कहते नहीं कुछ भी शायद मौन अजीज हे
शिकवा तो नहीं करते पर ये सजा ज्यादा हे।
मेरी इन्तहा मत लो सहने को घाव काफी हे
छोड़ दो मेरे हाल पे, जान लो कि में भी बेसब्र हु।
मंजिल कुछ भी हो साथ चलने को साथी हो बस
सफ़र आसां होगा गर आप यु रूठो नहीं।
गलत भी समझो मुझे तो ये भी नसीब हे मेरा
कह तो सकेंगे , मेरे हमदम ने कहा ऐसा।
पैगाम उन्हें ना मिला पर हलचल तो हे
मालूम नहीं कौनसा गुल खिलने वाला हे।
खयालों के तूफां को बहुत झेला अकेले ही
दो पल ही सही कुछ तो बोलो मुस्करा कर।
वीराने में औस गिरी , पर अंगारो पर
चाँद को नहीं मालूम क्या गुजरी बहारो पर।
_______  अशोक मादरेचा

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