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संदेश (Message)


बुने हुए सपनों पे कभी मत इतराना
बीच रास्तों में कभी मत घबराना।

इनको सच होने में वक़्त लगता है
आरम्भ में सब कुछ सख्त लगता है।

धीरज का हाथ थामे आगे बढ़ते रहना
परिश्रम और प्रयास, बस करते रहना।

बहुत थकान आएगी निराश मत होना
कभी हार भी जाओ तो हताश मत होना।

कांटो को देख कभी पीछे मत हट जाना
जहां हो मुश्किलें पहले वहीं डट जाना।

हर चुनौती का साहस से उत्तर देना
आंखों में आंखे डाल प्रत्योत्तर देना।

तपता सूरज, कहीं बादल, कहीं बरसाते
इसमें नया नही कुछ कहीं दिन, कही राते।

अपनी रप्तार और दिशा का ध्यान रखना
जोश में होश ना खोना इसका भान रखना।

याद रहे रणनीति में फेरबदल बहुत कुछ करना
पर ध्यान रहे भरोसा कब कितना किस पर करना।

                                                  मेरा पुनःआग्रह है तुम्हें, नीति और नियत से चलना
                                                   फिर जिंदगी में दूर नही होगा मंजिल से मिलना।।
                                                      
                                                                                           ----- अशोक मादरेचा
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बस करो अब... (Enough is Enough)



बस करो अब ये दिखावा
खुद जिंदगी तंग होने लगी है।
कभी तो सुन लो अंतर की पुकार
देखो वो तार तार होने लगी है।
क्या साबित करोगे,और किसे पड़ी है तुम्हारी
अहंकार की जमीन भी हिलने लगी है।
मीठे बोल कर जहर घोलते रहे चुपचाप
भरोसे की नीवं हिलने लगी है।
क्या बचाओगे, क्या संभालोगे
पानी में भी तो आग लगने लगी है।
जिनके जज्बातों से खेलते रहे ताजिंदगी
अब उनकी आँहें बहुत सताने लगी है।
आजकल जेबों में कुछ रुकता नहीं
उनमे भी पैबंद लगने लगी है।
आडम्बर की आड़ में खुद को गिराते गए
नतीजा देखो, दुनियां तुम्हे गिराने लगी है।
सच को झूठ कितना बनाओगे
समय की मार तो पड़ने लगी है।
अपनी सांसो पे गरूर करते हो
वो देखो धीमी हो गयी, शायद थमने लगी है।

(Hindi poem on living life with double standard)

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हकीकत (Truth)


हमें रोकने की हर कोशिश कर रहे वो
फूटे गुब्बारों में हवा भर रहे वो।
हर महफ़िल में उनके इंतजाम हो गए
हमारी बदनामी के किस्से आम हो गए।
कुछ मेरे अपने उनके साथ हो लिये
कुछ उनके अपने मेरे साथ हो लिए।
रास्तों में काँटे बिछाना उनका सुकून था
हमें भी मंजिल पाने का बड़ा जूनून था।
हर मुश्किल एक नया पाठ पढ़ाती थी
अनजानी सी प्रेरणा आगे बढाती थी।
उस यात्रा का हर मोड़ और पड़ाव याद है
वो रूकावटो के दौर भी बखूबी याद है।
कोई गिला शिकवा नहीं दौरे मोहब्बत में
सीखा समझा बहुत कुछ उनकी सोहबत में।
कद्र और कदरदान अब कहाँ नजर आते है
दो प्रेमी भी अब तो मिलने की रस्म निभाते है।
___ अशोक मादरेचा
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