जीवन की विडम्बनाएं (Irony of life)



अपने लंबे व्यावसायिक जीवन में मुझे कई व्यक्तियों से मिलने अथवा साथ काम करने का अनुभव मिला। जीवन अपने आप में पूर्ण नहीं होता। किसी को कुछ उपलब्ध नही तो किसी को जरूरत से ज्यादा वस्तुएं या सुविधाएं उपलब्ध है। आइये कुछ छोटी छोटी कहानियों के माध्यम से हम जीवन की सच्चाई को समझे:

1. एक होनहार उद्योगपति अपने बढ़ते व्यापार के बीच भी संतुष्ट नही था। कई बार उससे मिलने का मौका आया पर हर बार उसके चहेरे पर असन्तुष्टि स्पष्ट नजर आती थी। एक बार मुझे उसके साथ एक समारोह में जाने का संयोग बन गया और वहाँ जाकर उसके व्यवहार में आये बदलाव को देखकर मुझे समझ मे आया कि वो इतना असंतुष्ट क्यो था। मैंने देखा कि उस समारोह में उस उद्योगपति से भी कई बड़ी हस्तियां मौजूद थी और वो अपने से बड़े उद्योगपतियों के आगे पीछे घूम रहा था। मेरे मन मे विचार आया कि ये व्यक्ति कितना निर्धन है जो अपने पास सब कुछ होते हुए भी इस तरह से किसी अनजान भूख से सतत व्याकुल है। शायद उसे महत्वपूर्ण बनने की चाह थी या किसी की अनुकंपा पाने की अभिलाषा। सचमुच संसार मे हम अप्राप्त वस्तुओ के प्रति ज्यादा आकर्षित होते है और प्राप्त वस्तुओं के महत्व को समझ ही नही पाते।

2. एक युवा शादी करता है और कुछ ही दिनों के बाद उसका अपनी पत्नी से मोहभंग हो जाता है। कारण जानकर आश्चर्य होगा कि उसकी पत्नी सीधी, संस्कारी और पारिवारिक मूल्यों को समझने वाली थी। उस युवा को आधुनिक, पार्टी इत्यादि में रुचि रखनेवाली पत्नी चाहिए थी। नतीजा- तलाक हो गया। उसने फिर शादी की ओर आधुनिक पत्नी घर लाया। अब ये पत्नी घर का काम बिल्कुल नही करती और बड़ो का तिरस्कार करती । इस कहानी का भी यही सार है कि जो उपलब्ध है उसकी अवहेलना हो रही और जो दूर है उसकी अपेक्षा में वक़्त जाया हो रहा। इंसान रोज सिर्फ सपनों की दुनियां को हकीकत मान रहा। अपने कर्तव्य के बजाय हम अधिकारों की जानकारी ज्यादा रखते है और जीवन को अनायास ही नर्क में ढकेल देते है।

3. एक उच्च शिक्षा प्राप्त लड़की की शादी अच्छे खानदान में हो गयी। घर मे सब सुविधाएं थी, परन्तु लड़की का मानना था कि बाहर कोई कंपनी में जॉब किया जाय तो अच्छा रहेगा, जैसे पैसा हाथ मे आता रहेगा, घर का काम नही करना पड़ेगा आदि आदि। समय के साथ लड़की का घर से संपर्क कम होता गया,नतीजा ये हुआ कि संतान देरी से हुई, स्वास्थ्य पर स्थायी रूप से असर हो गया। बैंक में थोड़ा पैसा तो बढ़ गया पर घर के बजाय वो अनजाने में अपने जॉब ओर बोस की ग़ुलाम हो गयी। उसके घर पर बड़ा व्यापार था, उसको संभालने की पूरी आजादी भी थी पर होनी को कौन टाल सकता है, व्यक्ति दूर की अप्राप्त वस्तुओं पर आकर्षित होता है और घर के बजाय अन्य में सुख खोजने का प्रयत्न करता रहता है और इसी दौरान जीवन का स्वर्णिम समय बीत जाता है।




उपरोक्त तीन कहानियां सिर्फ संदर्भ के लिए यहाँ लिखी गयी है लेकिन वास्तविक जीवन मे हर व्यक्ति या परिवार में इस तरह की अनगिनत कहानियां रोज आकर लेती है। वास्तविकता ये है कि यदि हम दया, मैत्री, समता जैसे सद्गुणों को जीवन की दौड़ में बहुत पीछे छोड़ आये है। वर्तमान को भूल कर या तो बीते समय का रोना रोते है या भविष्य की चिंता में खोये रहते है।हम अपने आपको बहुत चतुर समझते है और दूसरों को अंधेरे में रख कर जीने को कला की संज्ञा देते है और ये मान लेते है कि इसका प्रतिफल भी हमारे नियंत्रण में है। मानवता के मूल्यों को जो अपनाता है उसके स्वाद का मजा तो वो ही ले सकता है। आज भी नियति अपना काम करती है। चलो कुछ पल ही सही, पर अपने अस्तित्व की सार्थकता के बारे में सोचे, क्या पता उनमे से ही कोई पल हमारी आंखे खोल दे और हम वास्तविक जीवन पथ को पहचान ले।
----- अशोक मादरेचा

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