Jainism सत्य और अहिंसा


साध लो मौन को, संतुलन स्वयं सधेगा
समय का अवांछित खर्च भी बचेगा।

हरदम कुछ प्रमाणित करने की चाहत
कोई खुश होगा तो कोई होगा आहत।

इस दौर में चरित्र का दोहरापन आम है
मत गिनो, इस सूची में बहुत से नाम है।

कल एक इंसान पे बहुत हंसना आया
कहता था, वो दूसरा इंसान खोज ना पाया।

बहुत सी भ्रांतियां पाले हम जीते है
भरे हुए दिखते पर अंदर तक रीते है।

करुणा और मैत्री सिमट गई किताबों में
महावीर की अहिंसा, आती है ख्वाबों में।

जीवन को फिर से जानने की जरूरत है
कितने बचे लोग जिन्हें सोचने की फुरसत है।

अपने दायित्व से मुंह मोड़ कर क्या हासिल कर लोगे
क्या सचमुच तुम जीत करके भी हार को वर लोगे।

इतना जल्दी मत हारो, विकारों का प्रतिकार करो
प्रांसगिक है आज भी सत्य और अहिंसा, करो तो जयजयकार करो।

--- अशोक मादरेचा  at the time of Jain Prayushan 2018


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भीड़ (Crowd)



ज्यादातर भीड़ प्रायोजित होती है। स्वस्फूर्त भीड़ तो बहुत ही कम होती है। भीड़ का अपना कोई दिमाग नहीं होता इस कारण इसे शातिर लोग जैसा चाहे हांकते है। सामान्य मनुष्य तो भीड़ के पीछे का हेतु समझ ही नहीं पाता। भीड़ के प्राण सामूहिक भावों में बसते है। जब तक इन भावों को भीड़ की मानसिकता में बसाए रखा जाता है भीड़ बिखरती नहीं।

भीड़ कई प्रकार की होती है पर मुख्य रूप से निम्न प्रकार की प्रचलन में है :

1. धार्मिक समूहों की भीड़
2. राजनीतिक फायदे वाली भीड़
3. सामाजिक कार्यक्रम वाली भीड़
4. मनोरंजन वाली भीड़
5. अकस्मात घटनाओं से प्रेरित भीड़

इसके अलावा कुछ भीड़ उपरोक्त में से दो या तीन प्रकार की एक साथ भी हो सकती है। भीड़ के मनोविज्ञान कोआज के युग में समझना बहुत जरूरी हो गया है। भीड़ के माध्यम से न जाने क्या क्या काम हो जाते है। हर भीड़ के बड़े बड़े प्रायोजक बहुत बड़े बड़े बजट ले कर काम करते है। इस भीड़ के द्वारा कोई अपना कद या प्रभाव दिखा पाता है तो कोई अपनी पहुंच। भारत जैसे देश में तो बहुत से व्यक्तियों के लिए ये रोजगार बन चुकी है।

अब मुद्दे की बात है कि में भीड़ के बारे में इतना क्यों लिख रहा हूं। जब अनपढ़ लोगों के साथ साथ बुद्धिजीवी भी भीड़ की मानसिकता में जीने की राह खोजने की चेष्टा करते है तो बहुत दुख होता है। किसी विचार की मौलिकता परखे बिना आंख बंद करके किसी का अनुसरण करना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। शायद इसी अवस्था में लोगों को देख कर मुझे इस पर लिखने का विचार आया। कोई कुछ भी कह दे या कोई घटना होती है तो इसके पीछे छुपे हुए हेतु को समझना चाहिए। तुरंत प्रतिक्रिया और भीड़ इकठ्ठा कर लेना शायद किसी और का मकसद हो और आप अनजाने में ही इसका शिकार हो रहे हो इसका ध्यान रखना चाहिए।

आपको जीवन के हर मोड़ पर भीड़ इकट्ठा करने वाले लोगों से सावधान रहना होगा। भीड़ से माहौल दिखता है पर रचनात्मकता भीड़ से नहीं आ सकती। आपको भीड़ में सब साथ में दिखाई देंगे पर अकेले में आपकी मुसीबत में ये भीड़ कभी साथ नहीं देगी। भूलकर भी भीड़ पर मत इतराना नहीं तो सच्चाई से सामना करना मुश्किल हो जाएगा। भीड़ जब छट जाती है तो वहीं माहौल सूनेपन में तब्दील हो जाता है।

थोड़ा और इस विषय को रोचक बनाए तो भीड़ को दो और पहलू पर विचार करना होगा। कुछ भीड़ सुखप्रेरित होती है तो कुछ दुख प्रेरित। सुख प्रेरित भीड़ में सपने दिखाएं जाते है और दुख प्रेरित भीड़ में दुख की पीड़ा दिखा कर सहानुभूति की खेती की जाती है। दोनों ही भीड़ के प्रायोजकों की भरमार है बस आप उन्हें देख नहीं पाते।

आशा है आपको भीड़ के मनोविज्ञान पर मेरे विचार पसंद आए होंगे। आपके सुझावों का मुझे इंतज़ार रहेगा।

धन्यवाद। अशोक मादरेचा
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