कविता (Hindi Poem)



मुझे चुनोतियाँ तो हर रोज मिलती है
मेरी कविता, सिर्फ सत्य जो कहती है।

ये कभी श्रंगार तो कभी वीर रस कहती है
निर्भय हो सत्ता के गलियारों से भी गुजरती है।

इस पर हर तूफान भी गुजर जाता
आकाश भी सीमित नही कर पाता।

रोकने की हर कोशिश इसे बृहत्तर कर देती
सूखते शब्दों के झरनों को फिर भर देती।

ये कविताएँ भूगोल नही मानती
स्वछंद ये, खुद के अस्तित्व को नही जानती।

बरबस इनका बनते जाना
शब्दों का चितवन में आना जाना।

ये तो बस शुरू होती है
नही कभी ये अंतिम होती है।

कितनों ने समझा इसे और आनंद लिया
बेशक कुछ बिरलों ने जी भर के इसे जिया।

बस इसे एक प्रेम ही नियंत्रित करता है
अंतर्मुखी बनाकर अभिमंत्रित करता है।

जब प्रेम से अध्यात्म की ओर अग्रसर होती है
कालजयी बन अक्सर वो कविता अमर होती है। 

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Near to Truth सत्य के करीब



A Hindi Poem on a situation of an experienced person guiding his kin about truth of life ...




                                                     मेरी लघुता को मजबूरी मत समझो
                                                   आप जीतते रहो, उसकी व्यवस्था है ये।

                                                  हम तो उस दिन जीतेंगे जब लोग कहेंगे
                                                     आप जीत गए हो अपने प्रयत्नों से।

                                                      रास्तों के कंकरों से दोस्ती है मेरी
                                                      ताकि वो कभी चुभे नही आपको।

                                                      गति तेज है, जरा सम्भलकर चलना
                                                      अभी तो दूर तक जाना है आपको।

                                                      मेरी कलम पर एतराज मत करो
                                                    इतिहास लिखना तो बाकी है अभी।

                                                   शंका के बादलों में छुप के मत रहो
                                                    जो कहना है, दिल खोल कर कहो।

                                              फैसला तो होठों तक आ चुका हाकिम के
                                           मजबूर वो आज तक, गवाहों के इंतजार में है।

                                              हम चलते है जमीन पे आपका ख्याल कर
                                               वरना उड़ना तो हमें भी खूब आता है।

                                               विश्वास की बुनियाद पर घर बनते है
                                             अन्यथा महलों को भी कौन पूछता है।

                                        मेरे आंगन के फूलों में कोई फूल ऐसा महके
                                       लोग बुलाए उस फूल को, विश्व धरोहर कहके।

                                             विचार लो और कर्तत्व को महत्व दो
                                            अविचल बनो ओर सत्य को सत्व दो।

                                      ऊंच नीच के फेर में आज भी यथार्थ का स्थान है
                               झूठ कितना भी पाल लो, सत्य ही महान है, सत्य ही महान है।

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विश्वास या भय ( Faith or Fear )


जीवन में कई बार ऐसी स्थितियाँ आ जाती है कि हम किस तरह जी रहे है और हमे किस तरह जीना था उसमें अंतर नही कर पाते। ज्यादातर लोग तो इस फर्क को समझ ही नही पाते और जो लोग जब तक समझ पाते, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इसी संदर्भ में आइए, हम जीवन में भय और विश्वास के बारे में कुछ जानने की कोशिश करते है। मेरे एक मित्र है जो नियमित रूप से किसी धार्मिक स्थान पर जाते है एवं उनकी मान्यताओं के अनुरूप पूजा-पाठ इत्यादि करते है
मेरे मन मे भी उनके प्रति बड़ा आदरभाव है। उनका हमेशा ऐसा मानना है कि धार्मिक क्रियाओं से व्यक्ति में अच्छाइयों के संस्कार आते है और काफी हद तक यह ठीक भी था। एक दिन किसी कारणवश वो अपनी इस नियमित क्रिया को कर नही पाये ओर योगवश उसी दिन उनके घर मे कोई बीमार हो गया। अब बीमारी कोई पूछकर तो आती नही पर मेरे मित्र के मन मे यह बात घर कर गई कि धार्मिक क्रिया नही की तो ऐसा हो गया। 
यहीं पर हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है। हम श्रद्धा और भय में अंतर नही करते और अपनी कहानी को ओर दुखद बनाने के सारे प्रयास करने लग जाते है। अब बताइये उपरोक्त अवस्था मे श्रद्धा कम थी या भय ज्यादा था। सचमुच सोचनीय विषय है। न तो हम श्रध्दा ओर न ही भय के अस्तित्व को पूरी तरह नकार सकते है। आपने कई बार ऐसा सुना होगा कि ऐसा नही करोगे तो ऐसा हो जाएगा। ऐसा करोगे तो बहुत अच्छा रहेगा। प्रश्न उठता है कि यदि मनुष्य या जीव कर्मो के अनुसार फल पाते है तो समाज में इतना भय कौन फैलाता है। सीधी सी बात है कि ये सब वो ही लोग करते है जिनको इन सबसे सीधा फायदा पहुँचता है। ये फायदा सिर्फ पैसों का ही नही वर्चस्व, नाम, और स्वामित्व के रूप मे भीे पहुंचता है।

हर एक व्यक्ति अपनी शुद्ध आत्मा के साथ इस संसार मे जन्म लेता है और अपने प्रारब्ध के अनुरूप जीवन जीता है। हँसने वाली बात तो यह है कि जब बहुत से लोग किसी बात को सत्य मानने लग जाते है तो उस कथित सामूहिक सत्य को सरल स्वभाव वाले व्यक्ति शंका तो नही करते बल्कि उसे और फैलाने लग पड़ते है और फिर शुरू होता है उनको फंसानेका खेल। विश्वास करना चाहिए पर यह अंधा विश्वास नहीं हो इसका सदैव ख्याल रखना चाहिए।

हम कोई कार्य विश्वास से प्रेरित होकर रह है अथवा सिर्फ किसी ज्ञात या अज्ञात भय वश होकर कर रहे है इसका ज्ञान जरूरी है वरना आपको भटकाने के लिए पूरा जमाना तैयार खड़ा मिलेगा। अपना अनुभव और उससे उपजा विश्वास (trust), श्रद्धा ( faith) इन दोनों के फर्क को भी अच्छे से समझना चाहिए। इसके बाद डर (fear) और मान्यताओं (perceptions) को पहचाने। इसमें भी व्यक्तिगत और सामूहिक मान्यताओं को अलग अलग करके देखे तो आप समझ पाएंगे कि यह उल्लू बनाने का उद्योग कितना फल फूल रहा है। यहां मेरा यह आशय कभी नही है कि आप धर्म के विमुख बने, मेरा तो बस इतना मानना है कि कही सामुहिक मान्यताओं के चलते कहीं हम वास्तविक स्वआत्मा के विरूद्ध तो बर्ताव नही कर रहे, इसका भान सतत रहना चाहिए। हमारी धार्मिक साधना पद्धति भिन्न हो सकती है परंतु मन और ह्रदय दोनों जागृत रहे ऐसी अपेक्षा है।
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Hindi Poem on Journey पथिक



जिंदगी का अर्थ खोजने
मै राहों का पथिक बनकर चल पड़ा
उलझन है अब तक क्यों रहा खड़ा।

उजागर हो रहे नित्य नए अनुभव
कहीं नदियाँ, कहीं झरनों का कलरव।

वक़्त भी इम्तहां ले रहा
नित नई चुनोतियाँ दे रहा।

कई नए चेहरे सामने आते
कुछ उदास, कुछ मुस्काते।

हर मोड़ का मौसम अलग हो जाता
कुछ भाता, कुछ नही सुहाता।

सालता कभी अकेलापन
कभी स्वजनों का अपनापन।

कभी शांत, कभी मुखर
कभी इधर तो कभी उधर।

कुछ भी घटित होता, हर पल अनूठा
मुखोटों की दुनिया मे कुछ सच्चा कुछ झूठा।

हे चुनोतियों ! में चुनोती देता हूँ
इन पंक्तियों के शब्दों से कहता हूं।

प्रेरित हूँ परिंदों की उड़ान से
नही रुकूँगा, मैं थकान से।

मंजिलें दूर सही, यात्रा तो जारी है
रोको मत मुझे, दूर तक चलने की तैयारी है।

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जिंदगी (Life)




कब मेरी तलाश का हिस्सा बन आप साथ हो चले
डर नही अब हमे राहों में कितनी भी हो मुश्किले।

मेरी चुप्पियों का अर्थ भी इस तरह असर कर जाएगा
कोई दूर से आकर भी आँखों मे आंसू भर जाएगा।

एक बूत सी जिंदगी और अनुभव से तराशे हुए पल
बहुत आशा थी मुझे, आप मिलोगे आज नही तो कल।

जैसे नव कौंपलो को ओस की बूंदों का इंतजार था
टकटकी लगाए चौखट पे खड़ा कबसे बेकरार था।

काश आप हरदम करीब रहते, ये मन कहता है
आप से लिपट कर अब खूब रोने का मन करता है।

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Honey Please....




I saw a storm in your eyes
Tears too were on rise

Something went wrong, I presume
Allow me to guess, or assume

Things are going complex
Honey, You need to relax

We had to express since long
We kept on walking along

I feel guilty for not doing something
Tell what is wrong, if anything

May I request you please
How can I make you please
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Accompany Whom You Need To



Life is a continuous management work. Sometimes we have a choice and sometimes not, so we must know what kind of people we should be surrounded. It's very important that to whom we accompany and who are our companions. Generally people of similar wavelength are friends, but sometime situations make people friendly, this may be due to commercial or other compulsions. Those who can differentiate between commercial and natural friendship are smarter than others. An individual and a family as a whole may need different kinds of friends, but one has to strike a balance.

Now, why this talk is going on. Our friends and people who are in regular contacts, affect us tremendously and I would say, constantly. One has to be very vigilant while adding someone in their contacts.

If more positive people are in our touch, we are less exposed to get affected by nervousness and conversely if we are surrounded by people having a negative mind-set, it is bound to affect our mentality too badly.

We must understand it properly that what kind of company we must keep and nurture it too. I have seen many people who don't own even minimum endurance and they are suffering a lot. What I mean to say here is that, a person develops his endurance too learning from people he accompanies. Similarly, we should also learn what kind of people makes us more resourceful. What are the resources, is an individual choice.

Our kind of friends can tell lots of things about us. Companionship is a very respected word, but we rarely review, how deeply it's affecting us. We really need to know, who should accompany us and whom should we.
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बदलते हमदम



( एक गुमराह पति के व्यवहार पर एक पत्नी की मनोदशा का चित्रण, एक कवि के शब्दों में )

इन निगाहों से तुम्हें बदलते देखा है
बारिशों में भी तुम्हें पिघलते देखा है।

माना कि हममें भी कुछ कमियां है
बीच बाजारों में तुम्हें बिकते देखा है।

तुम कहते कि किसी को मारना नही
पर हमने तुम्हें बंदूके खरीदते देखा है।

महफिलों में अक्सर खामोश रहते हो
तन्हाइयों में खूब गाते देखा है।

क्यूं परिंदों को पानी पिलाते हो
कितनों के गुलशन उजाड़ते देखा है।

उलझा दी है जिंदगी दौड़-भाग में
कई दफा तुम्हें नींद में चलते देखा है।

कहते हो कि तुम शराबी नही
दबे पांव महख़ानों में जाते देखा है।

लौट कर कभी तो आओ घर पे
मैंने तो तुम्हें सिर्फ निकलते देखा है।

बर्दाश्त नही यूँ  चुपचाप रोना तुम्हारा
क्या हुआ, तुम्हें तो हरदम हंसते देखा है।

                                                                            --- अशोक मादरेचा

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