Nature कुदरत



दुआओं की इमारत में रहता हूँ
आपने पूछा इसलिए कहता हूँ
नायाब इंसानियत की मजबूत दीवारे
प्यार की खुशबू, मौजों के फव्वारे
शांति के सागर में चांदनी की छटा
फैले आकाश में बादलों की घटा
चहुँ ओर फैली कुदरत की सुंदरता
गुलशन में उमड़ती फूलों की मादकता
भोर की अंगड़ाई, शीतल पवन का चलना
पनघट की ओर पनिहारिनों का निकलना
सिंदूरी आकाश में सूरज का आना
चिड़ियों के झुंड का खूब चहचहाना
नवकोपलों में व्याप्त होता परिपूर्ण जीवन
अभिव्यक्ति में असमर्थ गदगद होता मन
कलकल करते झरनों के पानी पर पड़ता प्रकाश
प्रकृति की हर रचना देखो होती कितनी खास
सब ये सोचकर मन को त्राण मिलता है
वर्षा से जैसे मरुधरा को प्राण मिलता है
नमन है प्रकृति को बारम्बार यही कहता हूं
बस दुआओं की इमारत में रहता हूं ।।
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समझदारी (Intelligence)


किसमें खुशी खोजते कुछ भी भान नहीं
अच्छे बुरे का कुछ ध्यान नहीं
आखिर समझदार जो हो गए है।

हर जगह खुदगर्जी का वर्तन
पसंद नहीं आते अच्छे परिवर्तन
आखिर समझदार जो हो गए है।

सिर्फ लेने में भरोसा, देने से कोसो दूर
तनाव और दुख में भी हंसने को मजबूर
आखिर समझदार जो हो गए है।

जमीन छोड़ दी, कुर्सियों के पीछे पड़ गए
चमक दमक में बचपन के दोस्त भूल गए
आखिर समझदार जो हो गए है।

सेहतमंद खाना छोड़ पिज्जों में उलझ गए
खुलकर हंसना छोड़ हम बहुत गम्भीर हो गए
आखिर समझदार जो हो गए है।

सहजता को मूर्खता कहते है
कुछ किताबें चाटकर गरुर पालते है
आखिर समझदार जो हो गए है।

अपनों के बीच भी परायों सा जीवन
हर जगह खुदगर्जी का वर्तन
आखिर समझदार जो हो गए है।

नकारते सच को मुखौटे पहनकर
अनसुना कर देते सच को सुनकर
आखिर समझदार जो हो गए है।

लगे है जोड़ने को पता नहीं कितना जोड़ेंगे
हम रिश्ते तोड़ देंगे पर जिद नहीं छोड़ेंगे
आखिर समझदार जो हो गए है।

-- अशोक मादरेचा

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अनबोले संदेश (Unspoken Message)


बहाने को अश्क शेष नहीं थे
पथराए से दोनों नयन थे
इंतजार के भाव थे
बेशक दिल में कहीं तो घाव थे।

वो नियति के मारे
शून्य को घूरते थे
आकाश भरा अकेलापन
शायद किसी को ढूंढते थे।

जैसे कई तूफान गुजरे उन पर से
बिखरे केसूओं से झांकते थे
गुजरते राहगीर उस तरफ
कुछ अजीब से आंकते थे।

होठों की कंपकपाहट के बीच
शब्द आकर तो लेते थे
मैं करीब गया, पर समझ नहीं पाया
अजनबी  "अशोक " को वो कुछ तो कहते थे।
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पीछा करता सत्य (Chasing Truth)


जिन्हें समय दिया जिंदगी भर
वो कहते है उन्हें फुरसत नहीं ।

व्यस्त है या बनाते बहाने
जरूर कुछ, गलतियां तो हुई ।

नए मित्रों के संग, नए नए प्रसंग
परिस्थितियां आज, बदल गई ।

जवानी है, ऊर्जा भी चरम पर
दृष्टि शायद कुछ बदल गई ।

अहसास कराने, कुछ भी कर लो
नावों की पतवारें तो फट गई ।

सब कुछ गतिमान अमर्यादित सा
शर्मो हया भी तो मिट गई ।

कुछ अनहोनी का अंदेशा हर किसी को
मानवता की तो नींव हिल गई ।

बेशुमार दौलत की उपलब्धियां
पर सेहत उनकी लील गई ।

सबके सब सपनों के सौदागर
सच्चाई अंदर ही अंदर घुट गई ।

बतियाना तो दूर, वो रुकते भी नहीं
कैसे बताऊं उनकी गाड़ी तो छूट गई ।

----- Ashok Madrecha





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टोह (Discovery)


कुछ तो शून्य में गोते लगाने का मन करता है
अब तो ये तन भी बहुत अनशन करता है। 

बोझिल सी पलको के पीछे छुपे हुए संदेश
चुप रहकर , समय भी कितना दफन करता है।

चले बहुत दूर तक बड़े काफिलों के संग
वो ही कहानी फिर, इंसान अकेला भ्रमण करता है।

समझे कुछ लोग, जानकर भी ना समझे
बेमेल समूहों में मनुज, विष वमन करता है।

जान ले जहां कि छोड़ी नहीं उम्मीदें मेंने
आज भी फसादों में इंसान ही अमन करता है।

अशोक मादरेचा
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Know a Prison around or within us


Many times, a question arises from the bottom of my heart, what kind of life I am living and what I ought to be, this scenario is repeated whenever I am alone. Probably it is a sign of a living soul.

When I look back, I find most of the time I was exposed to the environment wherein my thoughts, my deeds were influenced by survival and security for myself and my family and I would say I was prevented to think beyond. I was forced to make perceptions which suited to the so-called society and when I accepted it I was tagged as a gentleman. Whenever I raised some questions about the validity of any system, I was rewarded with sheer aloofness.

This is probably not my situation, anybody with some original thoughts faces it. A prison within us is created and constantly maintained by compulsions, and such compulsions are recognized by us knowing or unknowingly, willingly or unwillingly. We strive for comforts and make suitable adjustments. The Funniest part of this is that, most of the time we too help expanding this prison, probably to have more companions and eventually society finds better and more respectable prison to accommodate more prisoners. What a great thing happening around us! Wow!

These recognized prisons play very important role in influencing our judgment power. It's like if a prisoner doesn't behave as per prison's rules then he will be punished. Effectively all this process leads to create an environment full of fear.

All new inventions, thoughts, challenges these established prisons and their validity. To avail protection, they are always ready to bring in more influential prisoners to their fold like a political party admitting criminals to run their show behind the curtains.

How to overcome:

Though multiple prisons exist around us, we can avoid being caught in their clutches by remaining more vigilant.

Limit your Greed

If somebody is after money, fame or something else and that too by applying shortcuts then he is most vulnerable person and I would say "best prisoner". When thoughts are already guided by something or someone else possibilities of increasing prisoners would rise.

Know well about your fears:

many times, one is rich with resources, but his fear makes his life miserable. Know more about your fears. Study the facts and realities of situations. Most of the time situation does not warrant such fear to exist. If you are fearful, you will surrender and land in a prison.

Sustained efforts:

Whatever be the situation, sustained and focused efforts bring results. Destiny is our deeds and even if you think it cannot be changed, I would add, it can be modified.
Seek blissfulness:

Don't seek things instead think of complete blissfulness. Believe me, if you dream big, you achieve big. Never feel guilty about your surroundings. You achieve and reach what you really mean.

Let's be more vigilant about our surroundings and avoid being prisoners of so called prestigious prison waiting around us.
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दोस्त को पुकार (calling the friend)




सपनों का पीछा करता मनुज
गंतव्य को भूल बैठा

जब मंजिलें ना मिली
तो जहां रुका उसे ही मंजिल मान बैठा

जब कुछ खास हासिल ना हुआ तो
कुछ अखबारों की सुर्खियों में आकर
जीवन को धन्य मान बैठा...।

खैर जो हुआ सो हुआ
पर इसको आदत सी बना ली

अब तो नित्य ही कृत्रिम जिंदगी जी रहा
घूंट जहर के चुपचाप पी रहा

वो बतियाने को दोस्त भी ना साथ रहे
कुछ कहे तो भला किसको कहे....।

इतना आगे आ गए
कितने पीछे छूट गए

नदियों में पानी बहुत बहा
किनारों ने कितना सहा

चले थे कहां , मुकाम कुछ और मिले
भूलकर सब शिकवे और गिले
आ मेरे दोस्त हम फिर मिले
आ मेरे दोस्त हम फिर मिले....।
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मौन (Silence)



मेरे प्रश्नों से ज्यादा उलझे हुए थे उत्तर
सोचता हूं बोलू या चुप्पी साध लू। 

सत्य इतना जटिल भी होता है
पहले नही था अहसास कभी। 


हतप्रभ सी स्थिति में
कुछ भी सूझता नहीं था। 

बरबस सब होता गया
सध सी गई मानो भीड़ में निरवता
और किसी दुर्जन में भी समता। 

समय को मेरे शब्दों की ज़रूरत थी
और मज़बूरी को मौन की। 

किसे अपना लू किसे नहीं
असमंजस हावी था विवेक पर
ये सब ऐसा था जैसे प्रकाश में
होता अंधेरे का अनुभव। 

ठिठकती न्याय व्यवस्था
सिमटते विकल्प और समाधान
किंकर्तव्यविमूढ़ राजनीति आज
हर कोई जवाब की अपेक्षा में। 

मै खड़ा कर्तव्य पथ के दौराहों पर
आहटें थी कुछ पदचापों की
सत्य मौन साधे एकांत में
और असत्य अकड़ रहा था।

----- अशोक मादरेचा
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