सत्य के समीप

सत्य के समीप

कही मौन भाषा हे कही पे वक्तत्व .
ख़ुशी खोजने का उप्क्रुम सभी करते निरंतर
ता जिन्दगी उल्जन हे सत्य और असत्य का अंतर .
यही उल्जन आदत सी बन गयी कमोबेश सबकी ,
बचपन बिता तबसे ये परेशानी हे सबकी .
भटकती भीड़ के जुंड में अपना अस्तित्व क्या हे
और गर कोई जान भी गया तो भीड़ का हेतु क्या हे ?
कुछ तो मिलेगा ? ये कब तक चलेगा ?
क्या जींदगी यही हे या कुछ सार भी निकलेगा ?
रोज नए बहाने बनाकर हम सहज महसूस करते हे ,
जानकर अनजान हे , नाजुक हरदय को क्यों मायूस करते हे .
खुद से साक्षात्कार करे बिना हम अधूरे हे हरदम
खुशिया दो खुशिया मिलेगी यही हो अब अगला कदम .

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Oleh

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