आलंबन (Dependence)



असुरक्षा की भावनाओ से ओत प्रोत हम हर वक्त आलंबन की तलाश करते रहते हें। क्यों स्वयं की क्षमता पर हम भरोसा नहीं करते ? हमेशा हम जाने अनजाने किसी ओर के सहारे से सब ठीक होगा ऐसा क्यों सोचने लग जाते हे ?
अन्दर का डर या आलसीपन या फिर सब यही कर रहे हे इसलिए मुझे भी ऐसा करना चाहिए। यदि हम विश्लेषण करे तो आश्चर्य होगा की कमोबेश हर व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति, स्थान या परिस्तिथि विशेष पर आश्रित सी जिंदगी जीता हे। यदि इसे अव्यक्त गुलामी भी कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दूर द्रष्टी का नहीं होना इसका एक लक्षण अथवा कारण दोनों हो सकते हे।
हमारा स्वभाव स्वतंत्र हे परन्तु हम उसके सही स्वरुप को पुरी तरह नहीं पहचानते। जरा सा हिचकोला हमारे विश्वास को जड़ तक हिला देता हे।
ऐसा क्यों होता हे ? जन्म से अब तक हम सभी का परिवेश ही एसा हे कि हम सोचते भी उसी अनुरूप हे जेसे सब कुछ बाहर से ही संचालित होता हे भीतर की यात्रा के लिए तनिक भी तैयार नहीं हे।
सामान्य से सामान्य विषयों में हम धर्म, बाहरी शक्तियों ,कोई व्यक्ति विशेष, अथवा अन्य प्रतिको से अपेक्षा रखते हुए अपने निजी कार्यो का संपादन करा लेने की अपेक्षा रखते हे ओर अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने पर इन माध्यमो को जाने अनजाने कोसने लग जाते हे और अपने प्रयत्नों पर जोर देना लगभग छोड़ देते हे।
हर वक़्त अवलंबन (Dependence) की मनोस्थिति के कारण जीवन को हम अच्छे से जी नहीं पाते।  उदाहरण के लिए उत्सव आनंद देने के बजाय तनाव देते हे। स्वतंत्रता की पहचान आनंद में व्यक्त हो तो ही हम कह सकते हे कि हमारे प्रयत्न सही दिशा में हे।

Share

Do not Miss

आलंबन (Dependence)
4/ 5
Oleh

Subscribe via email

Like the above article? Add your email address to subscribe.