तड़पन



बरसों से बिखरा हुआ हूँ, अब तो मुझे सवाँर दो
बहुत तन्हा हूँ, थोड़ा ही सही पर कुछ तो प्यार दो।

वफ़ा के आइनों में पाक चेहरे कहाँ से लाऊँ में
बंद है दरवाजे सब बताओ कहाँ तक जाऊं मै।

वक़्त बदलता रहा , शहर के बाजारों की तरह
हमने शहर बदले आपकी तलाश में बंजारों की तरह।

उम्मीदों की रौशनी में हर पल याद आते हो
मेरे अपने हो फिर भी इतना जुल्म ढाते हो।

झील सी आँखे चेहरे पे गजब का नूर था
सिर्फ नज़रों से बाते की, मेरा क्या कसूर था।

इश्क के उसूल नहीं मालूम, आपका आना जरुरी है
बिलकुल मत कहना इस बार, फिर कोई मज़बूरी है।

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Oleh

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