दोहरी जिंदगी (Living with Double Standard)


समय के साथ हमारी प्राथमिकताएँ एवं अपेक्षाएँ दोनो बदलते रहते है परन्तु इन बदलावों की सार्थकता को हम कितना परखते है इस पर विचार की आवश्यकता है। किसी को दो जून की रोटी नसीब नहीं तो किसी को पैसा कहा रखना इस सब से फुरसत नहीं। परिवारों में बढ़ती हुई दरारें अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं एवं निजी सोच की उपज है।

कुछ सटीक उदाहरण :

पिता को सिर्फ कमाने से फुरसत नहीं
माँ कहती है मुझे स्वतंत्रता नहीं
बेटा बेटी अब माँ बाप को अब आदर्श नहीं मानते
रिश्तेदार अब औपचारिकता निभाते है
समाज शातिर लोगों का पिछलग्गू हो चला
धर्म के नाम पर दुकाने चल रही
दोस्त सिर्फ ख़ुशी में हिस्सा चाहते है

ऐसे में इंसान कितना अकेला हो गया है। अपनी संवेदनाओं को लेकर वो किसके पास जाये। किसको अपना दुखड़ा सुनाये। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया। व्यक्ति को अपनी गतिविधियों को समझ कर उन्हें समायोजित करना पड़ेगा। सिर्फ दूसरे क्या सोचेंगे इस डर से बाहर आना होगा। यदि हम अच्छा कार्य कर रहे परन्तु दूसरे दिन अखबारों में नाम या फ़ोटो नहीं छपा तो हमारा रक्तचाप बढ़ जाता है, जरा सोचिये क्या यही जीवन है? क्या किसान इतनी विपरीत परिस्थितियों में मेहनत करके राष्ट्र को अनाज देता है और एक सैनिक अपने जीवन की आहुति दे देता है, क्या वे सिर्फ अखबारों की सुर्खियां बटोरने के लिए करते है। हम छोटी सोच वाले बड़े लोग जैसा बर्ताव करते है। इस तरह का बनावटी व्यवहार हमें अंदर से बेहद कमज़ोर बनाता रहता है। इस कमजोरी का असर इतना व्यापक है की माँ बाप अपनी संतान को कुछ अच्छी सीख देने की इच्छाशक्ति भी खो चुके है। जब समय निकल जाता है तो सिर्फ किस्मत को दोष देकर मन को मनाते है। 

हम में से कितने लोग अपने बच्चों को किसी वीर पुरुष, महापुरुषों की कहानियां सुनाते है या उनसे सम्बंधित साहित्य उपलब्ध कराते है ? सत्य तो यह है कि हम स्वयं ही इसे या तो जरुरी नहीं समझते या हम खुद भी कुछ नहीं जानते। बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते है बचपन से उन्हें जैसा सिखाया या दिखाया जायेगा वैसा ही उनका आचरण आकार लेता जायेगा। एक बार अवचेतन मन प्रौढ़ हो गया तो उसका बदलना बहुत मुश्किल हो जाता है। 

मैने स्वयं कई मौकों पर लोगों को ऐसे प्रश्न करते देखा और ऐसा लगा कि हम जीवन के बारे में जानने की जरूरत तो महसुस करते है परंतु उसे हमारी प्राथमिकताओं में सम्मिलित नहीं करते और शायद इस उधेड़बुन में जिंदगी अपने आखरी पड़ाव तक पहुँच जाती है।

आपको कुछ शानदार और आँखे खोलने वाले उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ :

1. एक व्यक्ति सारी उम्र मेहनत करके पैसा जोड़ता है, परंतु संतान सुख नहीं होने के कारण वो अंत समय में उस पैसे को अन्य रिश्तेदारों के हाथो सौपने को मजबूर हुआ।
2. एक नेता जिसे लोग सलाम करते थे, अचानक किसी क़ानूनी प्रक्रियाओं मे फंस गया और आगे का
 जीवन दयनीय हो गया।
3. एक डॉक्टर अपने पुत्र का सही कॅरियर नहीं चुन पाये और अब निराश हो गए।
4. एक इन्जीनियर के चार पुत्र है परंतु आपसी मनमुटाव से पुरे घर में तनाव का माहौल सा है।
5. एक अच्छे खासे व्यापारी अपनी पैसे की तरलता को नहीं समझ पाये और बड़ा कर्ज का बोझ कर बैठे।
6. एक महाशय का कसूर सिर्फ इतना कि प्रकृति ने उनको बार बार अवसर दिए पर उन्होंने कभी गंभीरता
  से उन पर निर्णय नहीं लिए, नतीजा, आज उनका अधिकांश समय दूसरों को कोसने में बीतता है।
7. एक मोहतरमा ने कई प्रस्ताव ठुकरा दिए और अब बिना शादी किये अकेले जीना स्वीकार कर लिया।
8. हमारे एक मित्र को कोई भी नोकरी अच्छी नहीं लगती और वो हर 6 महीने में नई नोकरी की तलाश में व्यस्त हो जाते है। कहते हे आजकल अच्छे लोग ही नहीं रहे।

उपर्युक्त सभी उदाहरण कोई नकारात्मकता फ़ैलाने के उद्देश्य से नहीं लिखे गए वरन सभी इस बात के घौतक हे कि हम किस हद तक दोहरी जिंदगी जी रहे है। धरातल पर चल कर व्यवहारिकता को क्यों नहीं अपनाते। निरंतर सजा मिल रही फिर भी जीवन को जानना नहीं चाहते।

"खुद में ही मशगूल हुए जाने कौनसी मंजिल पाने को
खुशियां चौखट पे इंतजार करती रही पास आने को
इंतजाम में बीता वक़्त, तलाशती आँखे अब सुकून को
इतने भी लाचार नहीं, इंसान हो, छोड़ो इस जूनून को।"

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Oleh

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