शब्द संयोजन नहीं
मेरे गीत, मेरे अहसास
टटोलता खुदी को
होते नित नए आभास…।
भरा भरा सा मन
बड़ा ही प्रसन्न
फैली हुई महक सी
अहा! ये कैसा मधुबन ...।
बिन पंखो के उड़ रहा
जीवन किस ओर मुड़ रहा
बिखरा हुआ था अब तक
सहज ही क्यों जुड़ रहा...।
दिख रहा व्योम से परे
गोते लगाती आत्मा, सब सरोवर भरे
कुछ विशेष सा अनुभव
बिन बारिश, हो रहे रेगिस्तान हरे ...।
आनंद के स्पंदन
हर और अभिनंदन
बुझा ली सारी पहेलियाँ
प्रकाश ऊष्मा, वंदन, वंदन…।
स्वरूप बदलते काल खंड
प्रकट, कभी ओझल, फिर अखंड
समग्रता में दृष्टि गोचर
उड़े भाप बन, सारे पाखण्ड....।
मिटे रस भेद, सभी, ज्योति सूर्य प्रखर
सिर्फ शून्य का असर
विलीन विश्व स्वयं में
ध्वनियाँ गौण, बस मौन मुखर……।
साफ हुआ, युगों का भ्रम
अब क्या ज्यादा, और क्या कम
टूटे सारे वहम, न तू , न मैं
निर्बाध गति से, अनंत यात्रा का क्रम...।
प्रतिबोध देती अनंत रश्मियां
मिटी सब स्मृतियां
आलोकित सम्पूर्ण जगत, धन्य हुआ अवतार
अदभुत ये अनुभूतियां ....अदभुत ये अनुभूतियां..।
