Status or Stress ?


Journey of life comprises of so many achievements, wealth, respect, recognition, image, brand, skill, and so on. Collectively all this makes a person different and it creates status . As a human being we try to keep it up and up. We should ask ourselves at what level we are comfortable with this status or I would say it so called status in other way. The reality of life is that if we under unknown pressure try to keep on maintaining this status, it creates stress, so ideally it should be spontaneous and not an obligation on constant basis just to show off and impress others by engaging our positive energy.
Other side effects of  "So called Status" which I personally observed are:

1) Jump in level of attitude instead of gratitude
2) Lesser communication with friends and close relatives
3) Feeling loneliness even after crossing many milestones in life
4) absence of humour and increase of monotony
5) Constant irritation with self or others
6) Living artificial life
7) Chasing unwanted objects for more status
8) Developing health hazards

The list above is just illustrative, you can add more and more points at your end. Point to be noted is that achieving something in life is not wrong in itself  what we miss is we put ourselves in chasing something which is not that much required primarily though it may be necessary . We must draw a line in between the both to make life more easy, balanced,simple, and enjoyable.
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तनाव ( Stress )


तनाव का सबसे ज्यादा असर हमारे शरीर में दो जगहों पर होता हे, एक मस्तिष्क और दूसरा हर्दय। जब यह नाड़ी संस्थान ( nerve system ) को ज्यादा प्रभावित करता हे तो मधुमेह नाम की बिमारी के रूप में प्रकट होती हे और यदि ये तनाव हर्दय की तरफ बढ़ता हे तो हर्दय घात ( heart attack ) का कारण बन जाता हे। इसीलिए आजकल ये दोनों बीमारियाँ बड़े पेमाने पर सामने आ रही हे। अब प्रश्न यह हे कि तनाव क्यों उत्पन्न होता हे ? सरल शब्दों में कहूँ तो अति व्यस्तता ( over scheduling ) ही इन दो बिमारियों का मूल हे जिसे हम सभी को अच्छी तरह से समझने की आवश्यकता हे। हमें कितने की जरुरत हे और कितना चाहते हे इन दोनों का अंतर समझ कर अपनी अपनी मर्यादा का निश्चय समय रहते कर लेना चाहिए ।....
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सरहदों के मजबूर परिंदे
















जिन्हें मार दिया बेरहमी से आपने
वो परिंदे तो पानी की तलाश में थे।
सरहदों को नहीं समझते वो तो
प्यास बुझाने की आस में थे।
इंसानों ने बाटा जमीं आसमान को
वो तो उड़ते भी पास पास में थे।
गिरे तुम्हारी गोलीयों से जमीं पर
कितने सवाल उनकी साँस में थे।
यूँ मौत का सामान बनेगा इन्सान
मंजर ये निशां हर एक लाश में थे।
जिन्हें मार दिया बेरहमी से आपने
वो परिंदे तो पानी की तलाश में थे......।

……… अशोक मादरेचा
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Express Completely


Life provides us opportunities to express ourselves on varied fronts, be it social, academic, carrier wise, public forums or at personal level. Many of us not even recognise these opportunities and defer our decision to work on that and this all leads us to live without effectiveness. We as human being are most intellectual creature of the nature but our intelligence if not used properly can work against our own. 

Some questions we may ask to ourselves :

What debars us expressing completely in our deeds ?
Why hesitation takes prime place while working?
Why we do not create a sound image of ourselves?
Do we perform half heartedly?
Are we really interested in what we are doing ?
Do the outcome inspire us to  work towards it?
Is it a person , location or situation compelling to work ?
Are we so much compelled that we can not make the change we imagined ?

If we can find honest answers of all these questions from ourselves , a kind of clarity we can have towards the life we really wish to live.
whatever we do, barring very few exception of diplomacy , express yourself completely to the extent you can and it will culminate into a big success even you did not sought sometime. half way expressing brings monotony in life , be it job, carrier, education, society or even loving someone.

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Crowd puller or crowd follower

 
Why we live our life unsatisfied most of the time. If observed carefully, you will notice that we are either crowd follower or crowd puller. In both situation we remain part of crowd and try to justify ourselves that this is right and this is wrong. Crowd in its own has no brain still it behaves but unpredictably. What if a person too starts behaving in manner like crowd ? Peace would go away and fun of life too. He would always think what others would think if I do this or not do. Is this right way of doing or not according to crowd around him ?

How to remain part of crowd but behave independently and prudentially is what one should seek.Generally leaders are crowd pullers and public is followers but balancing life demands enough maturity to achieve independence constantly.

Let's go further .. Since our childhood we are moulded to think always in default mode like what is hot and cold, love and hate, up and down, good and bad, elder or younger, big or small, black or white, yes or no and it goes on.. This is what I would say crowd mentality . there are number of opposite combinations but you can't predict what odd combination would be picked up by the crowd. So we have to be independent to think and act accordingly then only we can say our journey towards balancing life is going on.
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आलंबन (Dependence)



असुरक्षा की भावनाओ से ओत प्रोत हम हर वक्त आलंबन की तलाश करते रहते हें। क्यों स्वयं की क्षमता पर हम भरोसा नहीं करते ? हमेशा हम जाने अनजाने किसी ओर के सहारे से सब ठीक होगा ऐसा क्यों सोचने लग जाते हे ?
अन्दर का डर या आलसीपन या फिर सब यही कर रहे हे इसलिए मुझे भी ऐसा करना चाहिए। यदि हम विश्लेषण करे तो आश्चर्य होगा की कमोबेश हर व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति, स्थान या परिस्तिथि विशेष पर आश्रित सी जिंदगी जीता हे। यदि इसे अव्यक्त गुलामी भी कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दूर द्रष्टी का नहीं होना इसका एक लक्षण अथवा कारण दोनों हो सकते हे।
हमारा स्वभाव स्वतंत्र हे परन्तु हम उसके सही स्वरुप को पुरी तरह नहीं पहचानते। जरा सा हिचकोला हमारे विश्वास को जड़ तक हिला देता हे।
ऐसा क्यों होता हे ? जन्म से अब तक हम सभी का परिवेश ही एसा हे कि हम सोचते भी उसी अनुरूप हे जेसे सब कुछ बाहर से ही संचालित होता हे भीतर की यात्रा के लिए तनिक भी तैयार नहीं हे।
सामान्य से सामान्य विषयों में हम धर्म, बाहरी शक्तियों ,कोई व्यक्ति विशेष, अथवा अन्य प्रतिको से अपेक्षा रखते हुए अपने निजी कार्यो का संपादन करा लेने की अपेक्षा रखते हे ओर अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने पर इन माध्यमो को जाने अनजाने कोसने लग जाते हे और अपने प्रयत्नों पर जोर देना लगभग छोड़ देते हे।
हर वक़्त अवलंबन (Dependence) की मनोस्थिति के कारण जीवन को हम अच्छे से जी नहीं पाते।  उदाहरण के लिए उत्सव आनंद देने के बजाय तनाव देते हे। स्वतंत्रता की पहचान आनंद में व्यक्त हो तो ही हम कह सकते हे कि हमारे प्रयत्न सही दिशा में हे।

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प्रकृति और अहसास (Nature and Feelings)

 एक अनोखी आभा सी
जब हर्दय ने महसूस की भीतर से
रश्मियों के पुंज का प्रकाश
फैला सब दिशाओं में
छट गया युगों का अँधेरा
बस कुछ ही पलों में
नव चैतन्य और श्रंगार से
सुसज्जित हुआ आकाश
चाँद भी लज्जित हुआ
सौंदर्य के प्रतिबोध से
सितारे अठखेलियां करने लगे नभ में
ओस की शीतलता ठहर गयी
कोपलों पे आकर तो
ह्रदय को नृत्य करते देखा पहली बार
नयनों से अमृत बरसने लगा बरबस ही
साक्षात सूर्य की लालिमा को आते हुए
और भोर को अंगड़ाई लेते देखा
प्रकृति की विराटता का आनंद बोध कहूँ इसे
या सचमुच का ईश दर्शन
पुलकित हो गए रोम रोम
पर  समकित होना बाकी है
मालूम नहीं , शायद यही शुरुआत हो ……....
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प्यार का संदेश (Message of Love )


हर रंग की चमक में बसते हो
कोई से भी गम में हँसते हो।
ये दिलेरी हे या अदाकारी
प्रेरित हो या , खुद की समझदारी।
बख़ूबी सब कुछ छुपाते हो
बस सिर्फ मुस्कराते हो।
मासूम चेहरा, इरादों से बुलंद हो
बोलते कम , बड़े स्वछंद हो।
हर पल ख्याल तेरा ही क्यों आता हे
क्या नाम दू इसे , जाने कौनसा नाता हे।
गीतों के गुंजन से भरा तेरे लबो का अहसास
समझ भी लेते मन की बात , तुम काश।
अब दूर नहीं रहना हे
मुझे कुछ कहना हे।
ये पैगाम पढ़कर रुक मत जाना
देर हुई पहले ही , अब मत सताना।
 ये हे प्यार का फ़साना , अब क्या जताना
मेरे मीत जल्दी आना , बस जल्दी आना।
------------ Ashok Madrecha

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