28 मई 2014

मंजिल (Destination)


असीम संभावनाओं को तलाशती
निगाहे निहारती खोजती
दिन रात मंजिल को.…।
बेसबब सी इस तलाश में
होती रही पीड़ा चाहे
कितनी ही दिल को …।
आखिर लगे हमें भी
कुछ तो ठानी है कि
सफर ये कटे अकेला
या कोई साथ रहे
बस हमें तो चलना हे
यूँ भी रुकने का अंजाम
यहाँ कुछ अच्छा नहीं होता
तो जरा साथ चल कर तो देखो
शायद मंजिल मुस्कराती
सामने आ मिले
और मिटे सारे गिले
अब ज्यादा सोचो मत
बस कूच करो
इन रास्तों पे आगे बढ़ने में
वक्त जाया न करो …।

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