29 जुल॰ 2014

सरहदों के मजबूर परिंदे
















जिन्हें मार दिया बेरहमी से आपने
वो परिंदे तो पानी की तलाश में थे।
सरहदों को नहीं समझते वो तो
प्यास बुझाने की आस में थे।
इंसानों ने बाटा जमीं आसमान को
वो तो उड़ते भी पास पास में थे।
गिरे तुम्हारी गोलीयों से जमीं पर
कितने सवाल उनकी साँस में थे।
यूँ मौत का सामान बनेगा इन्सान
मंजर ये निशां हर एक लाश में थे।
जिन्हें मार दिया बेरहमी से आपने
वो परिंदे तो पानी की तलाश में थे......।

……… अशोक मादरेचा

1 टिप्पणी:

जिंदगी के संदेश

विराम सा लग जाए जब   जिंदगी के संदेश , साफ तब।   कुछ पहले के , कुछ बाद के सबब कर्म अवरोध समय पर आरूढ़ अब।   पूछ रहा कालखंड , त्य...