Showing posts with label शेर शायरियाँ. Show all posts
Showing posts with label शेर शायरियाँ. Show all posts

बदलते हमदम



( एक गुमराह पति के व्यवहार पर एक पत्नी की मनोदशा का चित्रण, एक कवि के शब्दों में )

इन निगाहों से तुम्हें बदलते देखा है
बारिशों में भी तुम्हें पिघलते देखा है।

माना कि हममें भी कुछ कमियां है
बीच बाजारों में तुम्हें बिकते देखा है।

तुम कहते कि किसी को मारना नही
पर हमने तुम्हें बंदूके खरीदते देखा है।

महफिलों में अक्सर खामोश रहते हो
तन्हाइयों में खूब गाते देखा है।

क्यूं परिंदों को पानी पिलाते हो
कितनों के गुलशन उजाड़ते देखा है।

उलझा दी है जिंदगी दौड़-भाग में
कई दफा तुम्हें नींद में चलते देखा है।

कहते हो कि तुम शराबी नही
दबे पांव महख़ानों में जाते देखा है।

लौट कर कभी तो आओ घर पे
मैंने तो तुम्हें सिर्फ निकलते देखा है।

बर्दाश्त नही यूँ  चुपचाप रोना तुम्हारा
क्या हुआ, तुम्हें तो हरदम हंसते देखा है।

                                                                            --- अशोक मादरेचा

Read more

रूठे सनम से फरियाद (Complaining with an annoyed lover)


 
अरसे से बुला रहा हूँ तो जवाब भी नहीं देते
जरुरत चीज बड़ी, कहते है उड़ कर आ जाओ।

में गाफिल कहाँ था, वक़्त कमजोर था मेरा
जिसने सताया था, वो तो दोस्त था मेरा।

तेरी कतारों में कोई मेरा हमशक्ल रहा होगा
में तो दिल में था तेरे, कमबख्त खामोशियां पाले।

बोलते थे बहुत, कभी ध्यान नहीं गया
अब चुप क्या हुए, कयामत आ गयी।

सलीक़े से मेरी सब खबर रखते हो
अब क्या क़त्ल करने का इरादा है।

रूबरू होकर नजर भी नहीं मिलाते
लोग देखते है, चलो कुछ गुफ्तगू कर ले।

फासले जमीं के नहीँ थे
जहाँ थे तुम, हम भी तो वहीँ थे।

मेरी अक्स पे नजर डाले, गुजर जाते लोग
मील का पत्थर जो ठहरा तेरी राहों का।

पाक रिश्तों की पनाहों में कुछ गलतियां भी हुई होगी
वर्ना मोहब्बतें यूँ आसानी से बदनाम नहीं होती।

रूठे थे दिन में, रातों को मना लेते
इतने पत्थरदिल सनम हम नहीं थे।

अच्छा हुआ कि तन्हाइयों ने साथ निभाया
काश उनको आप सौतन तो मान लेते।

कम हो गया होगा नूर, ज़मीर तो जिन्दा है
चाहो तो बदस्तूर आजमा कर देख लो।

अल्फाझ तो मेरे हलक में अटके थे
लोग कहते रहे, पगला गया ये सख़्श।

गिले शिकवे तो अपने दरम्यां थे अशोक
नादान, नुरे इश्क का कसूर क्या था।


Read more

उम्मीदों का जहां


सन्नाटों में खुद के सायों से बाते करते हो
कहते कि अकेले नही, पर आहें भरते हो।
अरसा हो गया हमसे बात करके
अब ये मत कहना कि रोये नहीं जी भर के।
खुद को सजा देने की आदत तो पुरानी है
इश्क और इम्तहाँ की लंबी जो कहानी है।
कुछ बाँट लेते दर्द, ह्रदय तो हल्का हो जाता
गैर सही हम, अश्कों को अवकाश मिल जाता।
हर जगह सबको क़द्रदान कहाँ मिलते है
समय और संयोग से ही सुंदर फूल खिलते हैे।
पोंछ दो आँसू, उम्मीदों पर संसार चलता है
स्वीकार करो, आशाओं में प्यार पलता है।
कितनी देर हुई ये गिनती भी जरुरी नहीं
खुद को रोकना कोई मजबूरी नहीं।
कौनसे वक्त का इंतजार कर रहे हो
या किसी अनहोनी से डर रहे हो।
विश्वास करो, थाम लो मन की पतवार को
करीब है मंजिल, दस्तक तो दो द्वार को।
Read more

हकीकत (Truth)


हमें रोकने की हर कोशिश कर रहे वो
फूटे गुब्बारों में हवा भर रहे वो।
हर महफ़िल में उनके इंतजाम हो गए
हमारी बदनामी के किस्से आम हो गए।
कुछ मेरे अपने उनके साथ हो लिये
कुछ उनके अपने मेरे साथ हो लिए।
रास्तों में काँटे बिछाना उनका सुकून था
हमें भी मंजिल पाने का बड़ा जूनून था।
हर मुश्किल एक नया पाठ पढ़ाती थी
अनजानी सी प्रेरणा आगे बढाती थी।
उस यात्रा का हर मोड़ और पड़ाव याद है
वो रूकावटो के दौर भी बखूबी याद है।
कोई गिला शिकवा नहीं दौरे मोहब्बत में
सीखा समझा बहुत कुछ उनकी सोहबत में।
कद्र और कदरदान अब कहाँ नजर आते है
दो प्रेमी भी अब तो मिलने की रस्म निभाते है।
___ अशोक मादरेचा
Read more

तड़पन



बरसों से बिखरा हुआ हूँ, अब तो मुझे सवाँर दो
बहुत तन्हा हूँ, थोड़ा ही सही पर कुछ तो प्यार दो।

वफ़ा के आइनों में पाक चेहरे कहाँ से लाऊँ में
बंद है दरवाजे सब बताओ कहाँ तक जाऊं मै।

वक़्त बदलता रहा , शहर के बाजारों की तरह
हमने शहर बदले आपकी तलाश में बंजारों की तरह।

उम्मीदों की रौशनी में हर पल याद आते हो
मेरे अपने हो फिर भी इतना जुल्म ढाते हो।

झील सी आँखे चेहरे पे गजब का नूर था
सिर्फ नज़रों से बाते की, मेरा क्या कसूर था।

इश्क के उसूल नहीं मालूम, आपका आना जरुरी है
बिलकुल मत कहना इस बार, फिर कोई मज़बूरी है।
Read more

काश हम समझ पाते




भीड़ के भावावेश का भाग बनकर
इतराते रहे कि मंजिले पास है
कुछ चेहरे हाँक रहे उस भीड़ को
सब समझते रहे कि हम भी कुछ ख़ास हे .…।
क्या खूब सबने बहते पानी में
हाथ धोये जी भर के
सुविधा से एकत्र हुए देखो
खुश सब मर्जी की करनी कर के .…।
पता चला कि पानी ही अच्छा नहीं है
उस भीड़ में कोई सच्चा नहीं है
पर झूठ अपना कर सच को खो दिया
तमाशा देख ज़माने का , ये दिल रो दीया .…।
अश्कों का मूल्य अब कहाँ होता है
जगते दानव दिन रात, मनुज सोता है
सीधे रास्ते छोड़कर सब उलझनों में पड़ गये
कल के मासूम आज कितना अकड़ गये .…।
दुआ-सलाम का जमाना गुजर गया
बस कोई इधर गया कोई उधर गया
महंगी हुई मुस्कानें, देखो इन चेहरों की
आवाजों का असर नहीं होता, सारी बस्ती बहरों की .…।
- अशोक मादरेचा
Read more

उम्मीदों का आँगन



वक्त के भाल पर सिलवटें बढ़ने लगी
मंजिल साधने आरजु उमड़ने लगी।
जान लो कि में ना थका नहीँ हारा हूं
आज भी बदस्तुर सिर्फ तुम्हारा हूँ।
तपते रेगिस्तान में फुहार आई
आप क्या आये बहार आयी।
इंतजार तो बहुत हुआ पर गम नहीं
सामने हो आप ये कुछ कम नहीं।
वादा करो हर वक़्त रूबरू रहोगे
हमसे हर गिला शिकवा कहोगे।
रोशन हुआ जहां आपकी नजरो से
क्या खूब निकले हम सब खतरों से।
साकार करेंगे हर एक सपना
आबाद रहे ये सकून अपना।

- अशोक मादरेचा
Read more

घर और इंसान



हमने ठिकाने बना लिए और
उनको मकानों का दर्जा भी दिया
काश घर बनाये होते
बेशक इतना कर्जा भी लिया।
हर दीवार चमकीली हे
सजा दिया बहुत सुन्दर तरीके से
गरूर का सामान बना दिया
क्या सकून भी लाये कुछ सलीके से।
सब सामान की जगह बना दी
हर कोने को भर दिया
आ जाते बूढ़े माँ बाप साथ रहने को
लगता कुछ तो अच्छा कर दिया।
हम आग से खेलते हे
पानी में बहते हुए
जिंदगी गुजार लेते हे
अजनबी से रहते हुए।
दौरे खुदगर्जी के तूफान में
इल्म रास नहीं आएगा
चलते रहना , गिरना मत
वर्ना कोई पास नहीं आएगा।
मकान तो बहुत हे कहने को
घर कहाँ मिलते हे
शरीर बहुत हे चलते फिरते
पर साथ चलने को इंसान कहाँ मिलते हे ।
Read more