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प्रकृति और अहसास (Nature and Feelings)

 एक अनोखी आभा सी
जब हर्दय ने महसूस की भीतर से
रश्मियों के पुंज का प्रकाश
फैला सब दिशाओं में
छट गया युगों का अँधेरा
बस कुछ ही पलों में
नव चैतन्य और श्रंगार से
सुसज्जित हुआ आकाश
चाँद भी लज्जित हुआ
सौंदर्य के प्रतिबोध से
सितारे अठखेलियां करने लगे नभ में
ओस की शीतलता ठहर गयी
कोपलों पे आकर तो
ह्रदय को नृत्य करते देखा पहली बार
नयनों से अमृत बरसने लगा बरबस ही
साक्षात सूर्य की लालिमा को आते हुए
और भोर को अंगड़ाई लेते देखा
प्रकृति की विराटता का आनंद बोध कहूँ इसे
या सचमुच का ईश दर्शन
पुलकित हो गए रोम रोम
पर  समकित होना बाकी है
मालूम नहीं , शायद यही शुरुआत हो ……....
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सत्य (Truth)



कितने पड़ाव पार कर इस यात्रा मे
क्यू आज फ़िर से अकेले खड़े …।
शायद बहुत कमाई धन दौलत
और नाम से भी हो गये बड़े …।
तलाशती आँखे अपनों को जो
इस दौड़ मे कब के बिछुड़े… ।
रिश्तों के पौधों को पानी ना पिलाया
पत्ते सूखे , डाली सूखी , सूख गइ झड़े…।
झूठी दीवारों को घर का नाम दिया
और आपाधापी मे , सबसे रिश्ते बिग़डे …।
अहंकार ने बदल दी , सारी परिभाषाएं
आकंठ दुखी होकर भी इतना अड़े …।
करुणा और मैत्री के रंग दिखते नहीं
हे मनुज तुम किस चक्कर मे पड़े …।
उलझने बढ़ती गई जीवन की राह मे
कहो मित्र ! तुम बड़े या तुम्हारे सपने बड़े …।
किस पर विजय पताका फ़हरानी हे जो
तुम हर पल , हर दम सबसे लड़े ……।
__________    अशोक मादरेचा
 This poem is true feeling of a person for his close friend who has created lot of wealth but lost all his balance of life and now he is out of reach for him.
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तलाश (Search)


मन की थाह पाना मुश्किल है पर
यह कोशिश ख़ुशी देती है
कुछ पहेलियाँ ना सुलझे तो भी
नये अनुभव तो देती हे........ ।
झील सी गहरी आँखों में तैरते प्रश्न
और उत्तर खोजने की जिज्ञाषा
शांत वातायन में बहुत बड़े
तूफ़ान का इशारा देती हे.…… ।
मुद्दत से खोजने की आरजू थी
रुबरु होकर आज बतियाने की बारी
क्यों मौन रहने का सन्देश देती हे
एकांत नहीं थी जिंदगी कभी
सुहाने सफ़र में भी , नीरवता में भी
उनिन्दो की नींद उड़ा देती हे.…।
अनूठे फूलो की सुंदरता
टहनी पे स्वाभाविक हे पर
खुशबु की मादकता अब
झूमने की चाहत देती हे
लबो से बोल नहीं निकलते
और आँखों की भाषा चुपचाप
कितना कुछ कह देती है...........।

This poem in Hindi states about state of mind where feeling and expression try to find their place in any relationship but words become unable to do so and the poem goes on......
 
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खुशी के फूल

 

प्रसन्नता के प्राप्त होने  इन्तजार
हर कोई , हर पल इतना बेकरार
सिर्फ औरो को दोष देने का सिलसिला
इसीलिए खुशी का फूल न खिला ………।
मुक्त होने का मन पर बांधते रहे हरदम
अवरुद्ध क्यों हुए चलते चलते ये कदम
उठती हुई टीस का कारण भी तो होगा
सच्ची क्षमा से इस पीड़ा का निवारण भी होगा ………।
घनगोर घटाए गिर आयी , फैलने लगा अँधेरा
चमकी हे बिजलियाँ वहीं , हुआ फिर सवेरा
फैलने दो आकाश तक प्रार्थना के प्रकाश को
जी लो जीवन जी भर के , जाने मत दो मधुमास को………।
भ्रम को जगह मत देना , झूठ को सतह मत देना
नीति के धर्मयुद्ध में , अनीति को फतह मत देना
अहसास मनुष्यता का रखकर जीने का मजा कुछ और हे
शकून देकर किसी को अमृत पीने का मजा कुछ और हे ………।
पल प्रतिपल हम भावों का संसार खड़ा कर देते हे
सम्भले न सम्भलता इतना व्यापार बड़ा कर देते है
वक़्त विश्राम लेने की सलाह देता हे सरेआम
हम  व्यस्त हे , बहुत जरुरी हे हमारे काम ………।
खुद से संवाद भी नहीं कर पाते  पूरी जिंदगी
अब निश्चय स्वयं कर लो ये पूरी हे या अधूरी जिंदगी ………।
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प्रकृती की सुंदरता का अहसास


प्रकृती के बिखरे ख़जाने को निहारते रहे
निरन्तर , बस बरबस से……
हरी चादर सि ओढ़ा दी , दूर तक वादियो में
सुदूर तक बर्फ की सफेदी और भोर की धूप
उमड़ते सैलानी , घाटी कि ओर पुरे मन से ....
निखरती छटाएँ , उमड़ती घटाएँ
नीले अम्बर से धरा तक फैले सौंदर्य के
अदभुत से नज़ारे , सचमुच द्रश्य नयनाभिराम
हर अवयक्त को उन्मुक्त करके व्यक्त करता
वातायन का सुन्दर सा विधान
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