कटाक्ष


 कटाक्ष

शराफ़त के ज़माने अब कहाँ
यूँ अकेले मत पड़ो यहाँ वहाँ।

समूहों के झुण्ड आस पास है
कोई साधारण, कोई खास है।

हर कोई खींचने की फ़िराक में
मना करो तो आ जाते आँख में।

जंगल छोड़ भेड़िये शहरों में आने लगे
सुन्दर लिबासों में शरीफों को लुभाने लगे।

ख्वाब बेचने का व्यापार चल पड़ा
लालच में हर कोई मचल पड़ा।

समूहों में हर चीज जायज हो जाती
विचारधाराएं ख़ारिज हो जाती।

नये दौर के तर्क नए , सत्य स्वयं भटक गया
इंसान इंसानियत छोड़, समूहों में अटक गया।

ईमान कम बचा , नियति तो बहुत स्पष्ट है
शिकायत किससे करे जब पूरा तन्त्र ही भ्रष्ट है।

...... अशोक मादरेचा 
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Happening Quotient

Recently I was going through the trend of commonly asked questions raised by people in seminars on motivation, I clearly sensed that there is a common tendency of having lack of clarity about how to get things done faster and most of the questions were raised had same essence, though raised in different words and tones by different individuals.
Previous experience says that everything which happens always had its very own "happening quotient". Happening quotient is like feasibility apprehended in advance. In larger term it includes mapping of resources, approach, timing, location and anticipation of probable situations. We come across many people with repeated complaints about many things not happening as per their wishes. In the reply to them, some may talk about destiny and others will talk about blaming something and things goes on. 




Let us understand it more precisely, farmers sow seed and grow crops. It's not as easy as it is mentioned. The combination of timely seed sowing in fertile land with availability of adequate rain or water, sunlight, fertilizer and constant care all resulted in a good crop. What is important here is to understand in simple term that to get success or accomplishing something one has to understand its probability in context with other factors and resources and its availability in a given situation.

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पंख लगे मन को (Heart With Wings)


शब्दो में समेटना मुश्किल है मन को
बेलगाम होकर छीन लेता ये अमन को।
ये खुश तो दुनिया हरी भरी हो जाती है
ये रूठा तो सब योजनाएं धरी रह जाती है।
समय से परे, पल पल में रंग बदलता है
अनिश्चय में तो ये नटखट खूब मचलता है।
हवा की छोड़ो, आवाज से तेज दौड़ता
समझना मुश्किल, ये निशान भी नहीं छोड़ता।

गति पे सवार, कल्पनाओं के साथ रहने का आदी
कौन छीन सकता है भला मन की आजादी।
देश काल को ये कहाँ मानता
मर्यादित होना नहीं जानता।
मन का वेग प्रबल होता है
सतत जागरण, ये कहाँ सोता है।

अपना पराया ऊँच नीच , मन के लिए विचार है
अपरिमित ऊर्जावान , मन तो अनाकार है।
वो भावों में बसता, भावों में जीता है
भरा हुआ कभी, कभी वो रीता है।
कभी संयत, कभी उन्मुक्त सा हो जाता
बिखर जाता ये कभी सयुंक्त सा हो जाता।
त्वरित बदलावों के नेतृत्व को हर वक़्त तत्पर
ये मत पूछना, चलेगा ये कौनसे पथ पर।
अवसादों से ग्रसित होता जब ये सिमट जाता
उत्साह में आनंदित होकर खुशियों से लिपट जाता।
यात्रा का शौक इसे पल में अंतरिक्ष को नाप लेता
हर परिवर्तन को ये पहले से भांप लेता।
गतिशील मन रुकता नहीं, इसे तो समझना पड़ता है
ना समझों तो आजीवन झगड़ना पड़ता है।
मन को जो मना लिया हर राह आसान बन जाती
वर्ना कितनों की तो जान पे बन आती।
समतल मैदानों में कभी कंदराओं में जाकर आता
नदियों में कभी सागरों की लहरों से बातें कर आता।
कभी अर्थपूर्ण ये कभी निरर्थक घूम लेता
बखूबी आसमान के इंद्रधनुषी रंगों को चूम लेता।                      
कहने को ये तन इसका घर होता है
पर ताजिंदगी ये तो बेघर होता है।
कभी ये हल्का, कभी बोझिल हो जाता
कभी हँसाता, कभी खुद ही रो जाता।
कलुषित होता कभी ये निर्मल हो जाता
पहाड़ों से प्रबल कभी ये निर्बल हो जाता।
सक्रिय होता कभी ये निष्क्रिय हो जाता
कभी नीरस तो कभी प्रिय हो जाता।
ऊपर नीचे, कभी बीच में लटक जाता
किसी पे फ़िदा हो गया तो अटक जाता।
दयावान कभी ये निष्ठुर हो जाता
कभी ह्र्दय में तो कभी दूर हो जाता।
मन माने तो रिश्ते गहरे हो जाते
मन रूठे तो अपने भी दूर हो जाते।
अबाधित मन को जिसने जान लिया
वो सिद्ध बने साक्षात् जग ने भी ये मान लिया।
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Short Quotes on life


Evaluate yourself.. how many people you supported, how many appreciate you and to what extent it makes you happy. All these will make you understand better about your life and suddenly a change of 360 degree angle may become reality.
बताइये ... यदि हम हमारे सारे कार्यों , विचारों एवं संपर्कों , सभी में "मेरा क्या" और "मेरा कितना" इसी पर अपना ध्यान केंद्रित करते रहेंगे तो जीवन में सच्ची खुशियां कैसे प्राप्त करेंगे। परमार्थ में जिसने स्वार्थ खोज लिया उन्हें मेरा मेरा करने की जरुरत ही नहीं रहती।
Thinking from others perspective can make lot of difference in any relationship. Forgiveness is noble, it's never a defeat. Following noble thoughts will certainly bring happiness, just trust.
Having clarity about your priorities is a big achievement. Generally we are confused in choosing right priorities at different stages of life. Money, freedom and inner happiness are three basic choices available. Decide what exactly you wish to achieve and be happy in rest of your life.
Wishing someone on birthday or anniversary may seem to be routine but don't leave this, it is nice way to remain connected. Positive vibes are always for sharing and it prevents you from feeling lonely too.
Jealousy has strange feature, it is always born between related or known people. The moment you achieve something better than others, you don't have to create opponents, they sprout spontaneously. Only precaution you can take is, limit your display.
Right postures, proper breathing and a heart full of nice feeling leads your life out of chaos and all these makes you more healthy.
This is Info-tech age, tonnes of information are thrown around us. We have to choose what to see, process, accept, reject or simply ignore out of it.
"What I will get" can't be applied in every action. There are several occasions we come across where we should not think in this term. Many relations are sustaining because there are people who don't keep account of "what I will get"
You may not agree with someone but the way you differ, makes lot of difference.
अपने भम, पाले हुए डर और मान्यताओं पर गौर करो। जिंदगी को कभी दूसरे नजरिये से भी देखना चाहिए। सिर्फ अपने ही दृष्टिकोण से देखने से जीवन में ठहराव आ जाता है।
धार्मिक और आध्यात्मिक दो शब्द ऐसे है जिनका अंतर जानना जरूरी है। यदि आप धार्मिक हो तो आपके लिए बहुत से नियम इस संसार में पूर्वनिर्धारित है परन्तु यदि आप आध्यात्मिक हो तो आपको नियम की जरूरत शायद ही पड़े। 
 If you feel you missed something in life than just drop that thinking. It's damn sure even if you had achieved that, your worries would have remained for some other thing. It's all very common..take it easy and enjoy what your present offers you.
          ..... Ashok Madrecha 
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Start Living Life in Your Own Way




The great gap of our efforts and the yield creates a lot of dissatisfaction. Whenever I asked about life in my conferences, I noticed some common things prevailing such as lack of clarity, and everybody was more concerned about others. The funny part was that those who thought they are more committed to family, relatives, friends etc, they were more unhappy lot. In fact these people were in impression that they are doing a lot for family etc. but in turn they were emotionally bound and became more expecting from others but the Others were in comfortable zone and not thinking of the contribution made by their family members etc. One has to strike right kind of balance between self-development and helping others. 

We have to understand more about efforts, attachment and expectations. Being human, we take part in something, we stick to it without reason sometime, we start expecting returns, we behave like having sole onus of changing others. These are the set rules which govern our life. If we refresh our complete thought process and learn to accept changes and understand situations, joy of life will unleash forever. 

While taking more interest in others' life we completely forget about our own creativity. Everyone of us is unique and own some skill or art which is special but we hardly find enough time to nurture it as we are very busy studying others affairs. Living life in own way is awesome. When we shift our attention from others to ourselves we start knowing self and suddenly direction of life becomes reality. Some tips in nutshell:

6. If really decided, avoid procrastination and enjoy living life in your own way.

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टूटे पत्ते का दर्द (Pain of Broken Leaf)










वो कल कोपलों के बीच सबका प्यारा था
हरित चमक लिए, अनूठा वो सबसे न्यारा था।
ओस की बुँदे भी आकर उसपे ठहरती थी
हर चिड़िया उसका स्पर्श पाने को रूकती थी।
वो हरा भरा, उस पेड़ की डाल का गौरव था
उसकी दुनियाँ आबाद थी, सारा वैभव था।


समय की यात्रा में
वो रंग खोने लगा
हरा था , बाद में पीला पीला होने लगा।
एक दिन वो सूख गया और रोने लगा
जगा हुआ उसका संसार सोने लगा।
किसी ने नहीं सुनी उसकी, हवा का झोंका आया
छिटक गया वो डाल से, बोलो कुछ समझ में आया।
हर कोई दोहराता ये, बस वक़्त अलग होता है
फिर भी इंसान में गरूर कितना होता है।
आपाधापी में जिंदगी खूब मचलती, तड़पती
चेहरों पे नकाब डालने से उम्र नहीं बदलती।
कुछ अच्छा कर लेने की ठान लो
मनाओ मन को या खुद ही मान लो।

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दोहरी जिंदगी (Living with Double Standard)


समय के साथ हमारी प्राथमिकताएँ एवं अपेक्षाएँ दोनो बदलते रहते है परन्तु इन बदलावों की सार्थकता को हम कितना परखते है इस पर विचार की आवश्यकता है। किसी को दो जून की रोटी नसीब नहीं तो किसी को पैसा कहा रखना इस सब से फुरसत नहीं। परिवारों में बढ़ती हुई दरारें अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं एवं निजी सोच की उपज है।

कुछ सटीक उदाहरण :

पिता को सिर्फ कमाने से फुरसत नहीं
माँ कहती है मुझे स्वतंत्रता नहीं
बेटा बेटी अब माँ बाप को अब आदर्श नहीं मानते
रिश्तेदार अब औपचारिकता निभाते है
समाज शातिर लोगों का पिछलग्गू हो चला
धर्म के नाम पर दुकाने चल रही
दोस्त सिर्फ ख़ुशी में हिस्सा चाहते है

ऐसे में इंसान कितना अकेला हो गया है। अपनी संवेदनाओं को लेकर वो किसके पास जाये। किसको अपना दुखड़ा सुनाये। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया। व्यक्ति को अपनी गतिविधियों को समझ कर उन्हें समायोजित करना पड़ेगा। सिर्फ दूसरे क्या सोचेंगे इस डर से बाहर आना होगा। यदि हम अच्छा कार्य कर रहे परन्तु दूसरे दिन अखबारों में नाम या फ़ोटो नहीं छपा तो हमारा रक्तचाप बढ़ जाता है, जरा सोचिये क्या यही जीवन है? क्या किसान इतनी विपरीत परिस्थितियों में मेहनत करके राष्ट्र को अनाज देता है और एक सैनिक अपने जीवन की आहुति दे देता है, क्या वे सिर्फ अखबारों की सुर्खियां बटोरने के लिए करते है। हम छोटी सोच वाले बड़े लोग जैसा बर्ताव करते है। इस तरह का बनावटी व्यवहार हमें अंदर से बेहद कमज़ोर बनाता रहता है। इस कमजोरी का असर इतना व्यापक है की माँ बाप अपनी संतान को कुछ अच्छी सीख देने की इच्छाशक्ति भी खो चुके है। जब समय निकल जाता है तो सिर्फ किस्मत को दोष देकर मन को मनाते है। 

हम में से कितने लोग अपने बच्चों को किसी वीर पुरुष, महापुरुषों की कहानियां सुनाते है या उनसे सम्बंधित साहित्य उपलब्ध कराते है ? सत्य तो यह है कि हम स्वयं ही इसे या तो जरुरी नहीं समझते या हम खुद भी कुछ नहीं जानते। बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते है बचपन से उन्हें जैसा सिखाया या दिखाया जायेगा वैसा ही उनका आचरण आकार लेता जायेगा। एक बार अवचेतन मन प्रौढ़ हो गया तो उसका बदलना बहुत मुश्किल हो जाता है। 

मैने स्वयं कई मौकों पर लोगों को ऐसे प्रश्न करते देखा और ऐसा लगा कि हम जीवन के बारे में जानने की जरूरत तो महसुस करते है परंतु उसे हमारी प्राथमिकताओं में सम्मिलित नहीं करते और शायद इस उधेड़बुन में जिंदगी अपने आखरी पड़ाव तक पहुँच जाती है।

आपको कुछ शानदार और आँखे खोलने वाले उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ :

1. एक व्यक्ति सारी उम्र मेहनत करके पैसा जोड़ता है, परंतु संतान सुख नहीं होने के कारण वो अंत समय में उस पैसे को अन्य रिश्तेदारों के हाथो सौपने को मजबूर हुआ।
2. एक नेता जिसे लोग सलाम करते थे, अचानक किसी क़ानूनी प्रक्रियाओं मे फंस गया और आगे का
 जीवन दयनीय हो गया।
3. एक डॉक्टर अपने पुत्र का सही कॅरियर नहीं चुन पाये और अब निराश हो गए।
4. एक इन्जीनियर के चार पुत्र है परंतु आपसी मनमुटाव से पुरे घर में तनाव का माहौल सा है।
5. एक अच्छे खासे व्यापारी अपनी पैसे की तरलता को नहीं समझ पाये और बड़ा कर्ज का बोझ कर बैठे।
6. एक महाशय का कसूर सिर्फ इतना कि प्रकृति ने उनको बार बार अवसर दिए पर उन्होंने कभी गंभीरता
  से उन पर निर्णय नहीं लिए, नतीजा, आज उनका अधिकांश समय दूसरों को कोसने में बीतता है।
7. एक मोहतरमा ने कई प्रस्ताव ठुकरा दिए और अब बिना शादी किये अकेले जीना स्वीकार कर लिया।
8. हमारे एक मित्र को कोई भी नोकरी अच्छी नहीं लगती और वो हर 6 महीने में नई नोकरी की तलाश में व्यस्त हो जाते है। कहते हे आजकल अच्छे लोग ही नहीं रहे।

उपर्युक्त सभी उदाहरण कोई नकारात्मकता फ़ैलाने के उद्देश्य से नहीं लिखे गए वरन सभी इस बात के घौतक हे कि हम किस हद तक दोहरी जिंदगी जी रहे है। धरातल पर चल कर व्यवहारिकता को क्यों नहीं अपनाते। निरंतर सजा मिल रही फिर भी जीवन को जानना नहीं चाहते।

"खुद में ही मशगूल हुए जाने कौनसी मंजिल पाने को
खुशियां चौखट पे इंतजार करती रही पास आने को
इंतजाम में बीता वक़्त, तलाशती आँखे अब सुकून को
इतने भी लाचार नहीं, इंसान हो, छोड़ो इस जूनून को।"
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रूठे सनम से फरियाद (Complaining with an annoyed lover)


 
अरसे से बुला रहा हूँ तो जवाब भी नहीं देते
जरुरत चीज बड़ी, कहते है उड़ कर आ जाओ।

में गाफिल कहाँ था, वक़्त कमजोर था मेरा
जिसने सताया था, वो तो दोस्त था मेरा।

तेरी कतारों में कोई मेरा हमशक्ल रहा होगा
में तो दिल में था तेरे, कमबख्त खामोशियां पाले।

बोलते थे बहुत, कभी ध्यान नहीं गया
अब चुप क्या हुए, कयामत आ गयी।

सलीक़े से मेरी सब खबर रखते हो
अब क्या क़त्ल करने का इरादा है।

रूबरू होकर नजर भी नहीं मिलाते
लोग देखते है, चलो कुछ गुफ्तगू कर ले।

फासले जमीं के नहीँ थे
जहाँ थे तुम, हम भी तो वहीँ थे।

मेरी अक्स पे नजर डाले, गुजर जाते लोग
मील का पत्थर जो ठहरा तेरी राहों का।

पाक रिश्तों की पनाहों में कुछ गलतियां भी हुई होगी
वर्ना मोहब्बतें यूँ आसानी से बदनाम नहीं होती।

रूठे थे दिन में, रातों को मना लेते
इतने पत्थरदिल सनम हम नहीं थे।

अच्छा हुआ कि तन्हाइयों ने साथ निभाया
काश उनको आप सौतन तो मान लेते।

कम हो गया होगा नूर, ज़मीर तो जिन्दा है
चाहो तो बदस्तूर आजमा कर देख लो।

अल्फाझ तो मेरे हलक में अटके थे
लोग कहते रहे, पगला गया ये सख़्श।

गिले शिकवे तो अपने दरम्यां थे अशोक
नादान, नुरे इश्क का कसूर क्या था।


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